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पश्चिम बंगाल में मतुआ समुदाय की चुनावी भूमिका: ‘किंगमेकर’ की स्थिति और भाजपा के साथ बदलते समीकरण का विश्लेषण

पश्चिम बंगाल में मतुआ समुदाय की चुनावी भूमिका: ‘किंगमेकर’ की स्थिति और भाजपा के साथ बदलते समीकरण का विश्लेषण

पश्चिम बंगाल की राजनीति में मतुआ समुदाय को अक्सर ‘सत्ता की चाबी’ या ‘किंगमेकर’ के रूप में वर्णित किया जाता है। इसका कारण केवल उनकी बड़ी जनसंख्या नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक सक्रियता और चुनावी प्रभाव है। विधानसभा से लेकर लोकसभा तक कई सीटों पर इस समुदाय का निर्णायक असर देखा गया है। ऐसे में दो अहम सवाल उभरते हैं—पहला, मतुआ समुदाय चुनावों में इतना प्रभावशाली क्यों है? और दूसरा, क्या यह समुदाय अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का स्थायी वोट बैंक बन चुका है?

मतुआ समुदाय की पृष्ठभूमि और जनसांख्यिकीय प्रभाव

मतुआ समुदाय मुख्य रूप से नमशूद्र (दलित) हिंदू समाज से जुड़ा है। इनके अधिकांश परिवार 1947 के विभाजन और 1971 के बांग्लादेश युद्ध के बाद पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से पश्चिम बंगाल आकर बसे। उत्तर और दक्षिण 24 परगना, नादिया, बोंगांव, रानाघाट और सीमावर्ती इलाकों में इनकी उल्लेखनीय उपस्थिति है। अनुमान है कि राज्य की कुल मतदाता संख्या का लगभग 17 से 20 प्रतिशत हिस्सा मतुआ समुदाय से जुड़ा हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि करीब 30 से 40 विधानसभा सीटों और 5 से 7 लोकसभा क्षेत्रों में उनका वोट निर्णायक भूमिका निभा सकता है। यही वजह है कि हर चुनाव में प्रमुख राजनीतिक दल इस समुदाय को साधने की कोशिश करते हैं।

‘किंगमेकर’ की छवि कैसे बनी?

मतुआ समुदाय की राजनीतिक सक्रियता ने उन्हें ‘स्विंग वोट’ के रूप में स्थापित किया है। वे किसी एक दल के स्थायी समर्थक नहीं रहे, बल्कि मुद्दों के आधार पर अपना रुख बदलते रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में बोंगांव सीट से भाजपा के शांतनु ठाकुर की जीत को मतुआ समर्थन से जोड़ा गया। वहीं 2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने मतुआ बहुल क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। इससे स्पष्ट होता है कि यह समुदाय चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

नागरिकता और CAA: राजनीतिक धुरी

मतुआ राजनीति का केंद्रीय मुद्दा नागरिकता रहा है। समुदाय के संस्थापक हरिचंद ठाकुर ने सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन की शुरुआत की थी। बांग्लादेश से आए कई मतुआ परिवारों को भारत में नागरिकता दस्तावेजों की कमी का सामना करना पड़ा।

2019 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के पारित होने के बाद समुदाय के एक बड़े वर्ग में उम्मीद जगी, क्योंकि यह गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता का रास्ता प्रदान करता है। भाजपा ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया और मतुआ बहुल इलाकों में समर्थन बढ़ाया। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस ने भी राज्य स्तर पर सामाजिक कल्याण योजनाओं, महिला सहायता कार्यक्रमों और स्थानीय नेतृत्व के जरिए समुदाय का समर्थन बनाए रखा। 2021 और 2024 के चुनावों में दोनों दलों के बीच मतुआ वोट को लेकर सीधी प्रतिस्पर्धा देखी गई।

SIR और दस्तावेजी प्रक्रिया की चिंता

2026 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) की प्रक्रिया शुरू हुई है। सख्त दस्तावेजीकरण की मांग के कारण समुदाय के कुछ हिस्सों में आशंका है कि जिनके पास पुराने कागजात नहीं हैं, वे मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं। यह मुद्दा संभावित रूप से 40 से अधिक विधानसभा सीटों को प्रभावित कर सकता है। भाजपा ने नागरिकता सहायता शिविरों का दावा किया है, जबकि कांग्रेस और अन्य दलों ने दस्तावेजी राहत की मांग उठाई है। इससे यह स्पष्ट है कि मतुआ समुदाय केवल चुनावी आंकड़ों का हिस्सा नहीं, बल्कि प्रशासनिक और नीतिगत बहस का केंद्र भी बन चुका है।

क्या मतुआ समुदाय भाजपा का स्थायी वोटर है?

इस प्रश्न का उत्तर जटिल है। हाल के वर्षों में विशेषकर CAA के मुद्दे पर समुदाय के एक बड़े वर्ग का झुकाव भाजपा की ओर देखा गया है। 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को मतुआ बहुल क्षेत्रों में लाभ मिला। लेकिन यह कहना कि पूरा मतुआ समुदाय भाजपा का स्थायी वोट बैंक बन गया है, राजनीतिक रूप से सरलीकरण होगा। 2021 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने भी इन क्षेत्रों में मजबूत प्रदर्शन किया। मतुआ नेतृत्व के भीतर भी राजनीतिक मतभेद हैं, जिससे वोटों का ध्रुवीकरण पूर्ण रूप से एकतरफा नहीं हुआ।

वर्तमान प्रतिनिधित्व और नेतृत्व

बोंगांव से सांसद शांतनु ठाकुर, जो मतुआ ‘फर्स्ट फैमिली’ से जुड़े हैं, भाजपा के प्रमुख चेहरे हैं और CAA के समर्थक रहे हैं। रानाघाट और अन्य क्षेत्रों में भी मतुआ समुदाय से जुड़े नेता सक्रिय हैं। वहीं तृणमूल कांग्रेस के प्रतिनिधि भी समुदाय के सामाजिक और राजनीतिक मंचों से जुड़े रहे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि मतुआ राजनीति बहु-दलीय प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र बनी हुई है।

मतुआ समुदाय पश्चिम बंगाल की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है। 17 से 20 प्रतिशत संभावित वोट शेयर और दर्जनों सीटों पर प्रभाव के कारण उन्हें ‘किंगमेकर’ कहा जाता है। हालांकि, यह समुदाय किसी एक दल का स्थायी वोट बैंक नहीं है। मुद्दों, नीतियों और स्थानीय नेतृत्व के आधार पर उनका राजनीतिक रुख बदल सकता है। नागरिकता, दस्तावेजी प्रक्रिया और स्थानीय विकास जैसे प्रश्न आने वाले चुनावों में फिर से यह तय करेंगे कि मतुआ समर्थन किसके पक्ष में जाता है। इस प्रकार, मतुआ समुदाय को भाजपा का पूर्णकालिक वोटर कहना जल्दबाजी होगी लेकिन यह भी स्पष्ट है कि बंगाल की सत्ता की राह में यह समुदाय अब भी एक निर्णायक और प्रभावशाली कारक बना हुआ है।

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