RSS ने फिर थमाया लालू यादव को चुनावी मुद्दा, 2025 बिहार चुनाव में ‘संविधान और आरक्षण’ बनेंगे महागठबंधन का ब्रह्मास्त्र

RSS ने फिर थमाया लालू यादव को चुनावी मुद्दा, 2025 बिहार चुनाव में ‘संविधान और आरक्षण’ बनेंगे महागठबंधन का ब्रह्मास्त्र

बिहार:  बिहार की राजनीति एक बार फिर उसी चौराहे पर खड़ी है, जहां से 2015 में सत्ता का समीकरण बदल गया था। उस चुनाव में लालू प्रसाद यादव ने जिस संविधान और आरक्षण को हथियार बनाया था, वह मुद्दा अब फिर जीवित हो उठा है — इस बार RSS सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले के बयान से। उन्होंने संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ जैसे शब्दों को हटाने की वकालत की है, और यही बयान लालू यादव को आगामी विधानसभा चुनाव में एक बार फिर धारदार अभियान चलाने का अवसर दे रहा है।

संविधान पर खतरे की आशंका को फिर जिंदा कर रही विपक्षी राजनीति

हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में भी संविधान से छेड़छाड़ का कोई प्रत्यक्ष प्रयास नहीं कर पाई है, फिर भी विपक्ष लगातार संविधान पर खतरे का नैरेटिव खड़ा करता रहा है। 2024 लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस और इंडिया गठबंधन ने इस आशंका को हथियार बनाया, जिसका असर संसद में उनकी सीटों में इज़ाफ़े के रूप में दिखा। अब यही रणनीति बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए अपनाई जा रही है।

लालू का “पुराना नुस्खा”, नया तेवर

लालू यादव ने RSS पर तीखा हमला करते हुए कहा: “देश के सबसे बड़े जातिवादी और नफरती संगठन RSS ने संविधान बदलने की बात कही है। इनकी इतनी हिम्मत नहीं कि संविधान और आरक्षण की तरफ़ आँख उठाकर देख सकें।”

लालू जानते हैं कि बिहार की राजनीति में जाति और आरक्षण सबसे भावनात्मक और वोट खींचने वाले मुद्दे हैं। यही वजह है कि वे इस बार फिर उसी “संविधान बचाओ, आरक्षण बचाओ” अभियान को केंद्र में रख कर मैदान में उतरने को तैयार हैं।

2015 की पुनरावृत्ति की तैयारी

2015 में जब RSS प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा की बात कही थी, तब लालू ने उसी बयान को हथियार बनाकर पूरे चुनावी विमर्श को घुमा दिया था। परिणामस्वरूप भाजपा की करारी हार हुई और महागठबंधन की सरकार बनी थी।
इस बार भी वही पैटर्न दिख रहा है—RSS की टिप्पणी और लालू यादव की त्वरित प्रतिक्रिया। ऐसे में 2025 का चुनाव भी बहुत हद तक 2015 के दोहराव जैसा नजर आने लगा है।

महागठबंधन का एजेंडा तैयार: रोजगार, पलायन और अब संविधान

महागठबंधन, जिसमें RJD, कांग्रेस और अन्य दल शामिल हैं, पहले ही रोजगार और पलायन जैसे मुद्दों को अपनी रणनीति का हिस्सा बना चुका है। तेजस्वी यादव जहां सरकारी नौकरी, युवाओं के लिए अवसर और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस ने NSUI अध्यक्ष कन्हैया कुमार को युवाओं के बीच सक्रिय कर रखा है।

अब लालू यादव का संविधान और आरक्षण का ब्रह्मास्त्र इन सारे मुद्दों को जोड़कर एक भावनात्मक-राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने जा रहा है।

प्रशांत किशोर और जन सुराज भी पलायन पर केंद्रित

बिहार में एक और चेहरा, जो जमीन से जनता को जोड़ने में लगा है — वह है प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी। वे अपनी पदयात्रा के दौरान पलायन को रोकने की गारंटी दे रहे हैं और युवाओं के भविष्य की चिंता को राजनीतिक हथियार बना रहे हैं। हालांकि वे महागठबंधन का हिस्सा नहीं हैं, पर विपक्षी विमर्श को मज़बूती देने का काम जरूर कर रहे हैं।

एनडीए की तैयारी: नौकरी गिनाकर जनता को साधने की कोशिश

सत्तारूढ़ एनडीए सरकार, जिसमें भाजपा और जेडीयू शामिल हैं, अपने कार्यकाल की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर सरकारी नौकरियों की संख्या को सामने रख रही है। सरकार यह बताने में जुटी है कि कितनी भर्तियां की गईं, कितने युवाओं को अवसर मिले, और कैसे बिहार विकास की राह पर है।

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