निजी शिक्षण संस्थानों में भी आरक्षण! कांग्रेस ने फिर क्यों उठाया मुद्दा?

नई दिल्ली: निजी शिक्षण संस्थानों में भी आरक्षण लागू करने की मांग एक बार फिर चर्चा में है। कांग्रेस ने संसदीय समिति के सुझाव का समर्थन करते हुए निजी संस्थानों में दलितों, आदिवासियों और पिछड़े तबके के लिए आरक्षण लागू करने की वकालत की है। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने इस मुद्दे को बहस में ला दिया है, जिससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या अब निजी संस्थानों में भी आरक्षण लागू होगा?

अनुच्छेद 15(5) और आरक्षण की पृष्ठभूमि

साल 2005 में यूपीए सरकार के दौरान 93वां संविधान संशोधन लाया गया, जिसके तहत अनुच्छेद 15(5) जोड़ा गया। इस प्रावधान में यह कहा गया कि सरकार सभी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण लागू कर सकती है, चाहे वे सरकारी हों या निजी। इसके बाद 2006 में यूपीए सरकार ने सरकारी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण लागू करने के लिए ‘केंद्रीय शिक्षण संस्थान (नामांकन में आरक्षण) कानून’ बनाया, लेकिन निजी संस्थानों में इसे लागू करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की भूमिका

2008 में सुप्रीम कोर्ट ने 2006 के कानून को संवैधानिक करार दिया था। इसके बाद 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘प्रामती एजुकेशनल और कल्चरल ट्रस्ट बनाम भारत राज्य’ मामले में अनुच्छेद 15(5) के प्रावधान को सही ठहराया। इसका मतलब था कि ओबीसी, एससी और एसटी समुदाय को निजी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण दिया जा सकता है। हालांकि, 2002 में सुप्रीम कोर्ट के टीएमए पाई मामले में आए फैसले ने कहा था कि निजी संस्थानों को अपनी प्रवेश प्रक्रिया तय करने का मौलिक अधिकार है। इस फैसले के चलते निजी संस्थानों में आरक्षण लागू करने की राह में बाधाएं आ सकती हैं।

अब यह मुद्दा फिर क्यों उठा?

हाल ही में कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने एक कानून लाकर निजी संस्थानों में आरक्षण लागू करने का सुझाव दिया है। कांग्रेस ने इस सुझाव का समर्थन करते हुए कहा कि वह इस विषय को अपने चुनावी घोषणापत्र में भी शामिल कर चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अनुच्छेद 15(5) में प्रावधान जरूर है, लेकिन इसे लागू करने के लिए सरकार को अलग से कानून बनाना होगा।

राजनीतिक मायने और प्रभाव

कांग्रेस का यह कदम सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा प्रयास माना जा सकता है। हालांकि, इससे निजी संस्थानों और सरकार के बीच टकराव की स्थिति भी बन सकती है। एक तरफ जहां सामाजिक समूह इसे सामाजिक समरसता का कदम मान सकते हैं, वहीं निजी संस्थान इसे अपने अधिकारों का हनन मान सकते हैं।

अगर सरकार इस दिशा में कोई कानून लाती है तो इसे न्यायिक समीक्षा का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही, इस विषय पर राजनीतिक और कानूनी बहस और तेज होने की संभावना है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस इस मुद्दे को कितनी मजबूती से आगे बढ़ाती है और क्या अन्य दल इसका समर्थन करते हैं या नहीं।

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