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नई दिल्ली, 27दिसंबर, 2020

कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन में शामिल पंजाब के अधिवक्ता अमरजीत सिंह (Advocate Amarjit singh commit suicide) ने आत्महत्या कर ली है. अमरजीत पंजाब में फाजिल्का जिले की जलालाबाद बार एसोसिएशन (Bar association) के अधिवक्ता थे और टिकरी बॉर्डर पर चल रहे आंदोलन (Farmers Protest)  के बीबी गुलाब कौर स्टेज के पास उन्होंने जान दे दी. पुलिस का कहना है कि टिकरी बॉर्डर से कुछ किलोमीटर दूर अमरजीत ने कथित तौर पर जहर खा लिया. उन्हें रोहतक के एक अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.

कथित सुसाइड नोट में अमरजीत सिंह (Advocate Amarjit singh) ने लिखा है कि वह किसान आंदोलन के समर्थन में और कृषि कानूनों के खिलाफ अपनी जान दे रहे हैं, ताकि सरकार जनता की आवाज सुनने को मजबूर हो जाए. पुलिस का कहना है कि वह 18 दिसंबर को लिखे गए सुसाइड नोट की सच्चाई की जांच कर रही है. हरियाणा के झज्जर जिले के एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि हमने मृतक के रिश्तेदारों को सूचना दी है और उनके आने पर बयान रिकॉर्ड किया जाएगा और कार्यवाही आगे बढ़ेगी. इससे पहले भी आत्महत्या के दो अन्य मामलों का दिल्ली की सीमाओं पर हो रहे किसान आंदोलन से संबंध पाया गया है. 65 साल के सिख प्रचारक संत राम सिंह ने सिंघु बॉर्डर पर कथित तौर पर खुदकुशी की थी.

पुलिस को कथित तौर पर अमरजीत का पत्र मिला है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi)  के नाम संबोधित है. इसमें कहा गया है कि आम जनता ने पूर्ण बहुमत, शक्ति के साथ आप पर पूरा भरोसा जताया. आम जनता को प्रधानमंत्री के तौर पर आपसे अच्छे भविष्य की उम्मीद थी. लेकिन बड़े ही दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि आप कुछ विशेष उद्योगपतियों के के प्रधानमंत्री बनकर रह गए हैं. इन तीन काले कानूनों के जरिये किसान और मजदूर खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं. जनता सड़क और रेल ट्रैक पर वोट की खातिर नहीं बल्कि अपनी और अपने परिवार की आजीविका बचाने के लिए है. पूंजीपतियों का पेट भरने के लिए आपने आम जनता और कृषि की कमर तोड़ दी है.

इसमें लिखा है, ‘कृपया करके किसानों, मजदूरों और आम जनता की रोजी-रोटी मत छीनिए और उन्हें जहर खाने के लिए मजबूर न कीजिए. सामाजिक तौर पर आपने जनता और राजनीतिक तौर पर आपने अकाली दल जैसे सहयोगी दलों को धोखा दिया है. लेकिन जनता की आवाज भगवान की आवाज होती है. कहा जा रहा है कि आपको गोधरा जैसा बलिदान चाहिए. इस वैश्विक आंदोलन के जरिये आपकी अंतरात्मा तक आवाज पहुंचाने के लिए मैं अपनी कुर्बानी दे रहा हूं.’ पत्र में पेन से भी  लिखा गया था कि जनता का न्यायपालिका से भी भरोसा उठ गया है. इसमें 18 दिसंबर की तारीख पड़ी हुई है.