उत्तर प्रदेश की राजनीति में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर दिया गया मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बयान बड़ा सियासी मुद्दा बन गया है। हालिया विधानसभा सत्र में मुख्यमंत्री ने पहली बार इस पूरे विवाद पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि “हर व्यक्ति शंकराचार्य नहीं बन सकता” और किसी भी धार्मिक पीठ की मर्यादा और परंपरा का पालन अनिवार्य है। उनके इस बयान के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने तीखा पलटवार करते हुए इसे अपमानजनक करार दिया और सियासत तेज हो गई।
सदन में CM योगी का विस्तृत पक्ष
शुक्रवार (13 फरवरी) को विधानसभा में बोलते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शंकराचार्य पद की परंपरा और नियुक्ति प्रक्रिया पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आदि जगद्गुरु शंकराचार्य की परंपरा में किसी भी पीठ के आचार्य की नियुक्ति एक निर्धारित और विधिवत प्रक्रिया के तहत होती है। योग्य व्यक्ति का मंत्र, भाष्य या कहें थीसिस विद्वत परिषद द्वारा अनुमोदित किया जाता है, उसके बाद अभिषेक और परंपरा की मान्यता दी जाती है। मुख्यमंत्री ने कहा कि कोई भी व्यक्ति स्वयं को किसी भी पीठ का आचार्य घोषित कर वातावरण खराब नहीं कर सकता। उन्होंने जोर देकर कहा कि मर्यादाओं का पालन सभी को करना होगा और धार्मिक परंपराओं का सम्मान आवश्यक है।
कानून-व्यवस्था और महाकुंभ का संदर्भ
मुख्यमंत्री ने अपने बयान में कानून-व्यवस्था और श्रद्धालुओं की सुरक्षा को भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि जब करोड़ों श्रद्धालु किसी धार्मिक आयोजन में शामिल होते हैं, तो प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। एग्जिट गेट, स्नान मार्ग और पंटून पुल जैसे संवेदनशील स्थानों से अनधिकृत प्रवेश भगदड़ जैसी स्थिति को जन्म दे सकता है। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई भी कदम श्रद्धालुओं के जीवन के साथ खिलवाड़ है। मुख्यमंत्री ने दोहराया कि सरकार कानून के शासन में विश्वास करती है और उसका पालन करवाना भी जानती है।
वाराणसी की घटना पर विपक्ष से सवाल
मुख्यमंत्री ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए वाराणसी की एक पूर्व घटना का जिक्र किया। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि संबंधित व्यक्ति को शंकराचार्य माना जा रहा था, तो उस समय लाठीचार्ज और एफआईआर क्यों दर्ज की गई थी। मुख्यमंत्री ने कहा कि नैतिकता की बात करने वाले पहले अपने आचरण की समीक्षा करें और लोगों को गुमराह करना बंद करें।
अखिलेश यादव का तीखा पलटवार
मुख्यमंत्री के बयान के बाद अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा कि शंकराचार्य के बारे में अपमानजनक शब्दों का प्रयोग शाब्दिक हिंसा है और पाप भी है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जब अहंकार बोलता है तो व्यक्ति अपने संस्कार भूल जाता है। अखिलेश ने आरोप लगाया कि बीजेपी विधायक सदन में तालियां बजाते हैं, लेकिन जनता के बीच उन्हें जवाब देना होगा।
महाकुंभ और मुआवजे पर सवाल
अखिलेश यादव ने महाकुंभ भगदड़ का मुद्दा उठाते हुए सरकार पर सच्चे आंकड़े न बताने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि मुआवजे के वितरण में पारदर्शिता नहीं बरती गई और जिन लोगों तक सहायता नहीं पहुंची, उनका हिसाब दिया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, जो सरकार खुद सवालों के घेरे में है, वह किसी धार्मिक पद की गरिमा पर प्रश्न उठाने का नैतिक अधिकार नहीं रखती।
विवाद की असली जड़
यह विवाद धार्मिक परंपरा, राजनीतिक बयानबाजी और प्रशासनिक कार्रवाई के त्रिकोण में खड़ा नजर आता है। सरकार का पक्ष है कि उसने केवल शास्त्रीय परंपरा और मर्यादा की बात की है और कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसका कर्तव्य है। वहीं विपक्ष इसे धार्मिक सम्मान और संवेदनशीलता से जोड़कर देख रहा है। धार्मिक पदों की गरिमा और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का यह मेल विवाद को और गहरा बना रहा है।
आगे क्या?
सदन में दिए गए बयान के बाद यह साफ है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गरमाएगा। विपक्ष इसे राजनीतिक और धार्मिक सम्मान का सवाल बना रहा है, जबकि सरकार इसे परंपरा और कानून के दायरे में देख रही है। अब देखना यह होगा कि क्या यह विवाद सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहेगा या फिर राजनीतिक रूप से बड़ा मुद्दा बनेगा। फिलहाल उत्तर प्रदेश की राजनीति में शंकराचार्य विवाद ने नया सियासी मोड़ ले लिया है और दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम हैं।




