आखिर क्या है जोशीमठ के धंसने की वजह, बार बार चेताने के बाद भी नहीं चेते, अब नतीजे भुगतने को रहें तैयार

आखिर क्या है जोशीमठ के धंसने की वजह, बार बार चेताने के बाद भी नहीं चेते, अब नतीजे भुगतने को रहें तैयार

उत्तराखंड के जोशीमठ में हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते जा रहे हैं। जमीन धंसने की वजह से यहां बने कई घर और होटलों में दरारें पड़ गई हैं और पानी रिस रहा है, जिसके चलते अब प्रशासन ने इस इलाके को अनसेफ जोन घोषित करते हुए  इन्हें गिराने का काम शुरू कर दिया है। अब तक कई होटलों और मकानों को खाली कराया जा चुका है। बता दें कि जोशीमठ के 650 से ज्यादा मकानों में दरारें पड़ चुकी हैं। इसके चलते अब तक 70 परिवारों को दूसरी जगह शिफ्ट किया जा चुका है। आखिर क्या है जोशीमठ के धंसने की वजह, आइए जानते हैं।

कहां बसा है जोशीमठ?
सबसे पहले जानते हैं कि जोशीमठ की भौगोलिक स्थिति क्या है। दरअसल, यह चमोली जिले में स्थित है, जो कि समुद्रतल से करीब 6,107 फीट की ऊंचाई पर बसा है। जोशीमठ की आबादी करीब 25000 के आसपास है। जोशीमठ को हिंदुओं और सिखों के पवित्र तीर्थ बद्रीनाथ और हेमकुंट साहिब का मुख्य द्वार भी कहा जाता है।

पहली बार कब पता चली जोशीमठ के धंसने की बात : 
24 दिसंबर, 2009 को सबसे पहले जोशीमठ के पहाड़ों के धंसने की बात उस वक्त पता चली, जब पहाड़ों को काटकर सुरंग खोदने वाली मशीन अचानक एक टनल में फंस गई। मशीन के सामने बड़े वेग के साथ पानी बहने लगा। ऐसा कई महीनों तक चलता रहा। इसकी वजह ये थी कि टनल खोदने वाली मशीन ने पहाड़ों पर बने प्राकृतिक जल भंडार को नुकसान पहुंचाया था। बता दें कि ये जल भंडार जोशीमठ के पास ही बहने वाली अलकनंदा नदी के बाएं किनारे पर स्थित एक पहाड़ के करीब किलोमीटर अंदर था।

क्या है जोशीमठ के धंसने की वजह?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सुरंग खोदने वाली मशीन से प्राकृतिक जल भंडार को हुए नुकसान के बाद इस इलाके के कई छोटे-बड़े झरने और पानी के सोते सूख चुके हैं। इसकी वजह से जिस पहाड़ पर जोशीमठ बसा है, उसके अंदर की जमीन भी सूख चुकी है। भीतर की जमीन सूखने की वजह से पहाड़ों का मलबा धसकने लगा है। ऐसे में अब जोशीमठ को धंसने से शायद ही कोई रोक पाए।

लैंडस्लाइड मटेरियल पर बसा है जोशीमठ : 
एक्सपर्ट्स का कहना है कि जोशीमठ पूरी तरह से लैंडस्लाइड मटेरियल पर बसा हुआ है। जो गुरुत्वाकर्षण की वजह से ग्लेशियरों के टूटने से निकले मलबे से बना है। जिस तरह से जोशीमठ धंस रहा है, उसे देखकर तो यही लगता है कि अब इसे जमींदोज होने से कोई नहीं रोक सकता। प्रशासन को जल्द से जल्द इस पूरे इलाके को खाली करा लेना चाहिए।

चेतावनी के बाद भी नहीं चेते लोग : 
1939 में सबसे पहले एक किताब सेंट्रल हिमालया, जियोलॉजिकल ऑब्जर्वेशन ऑफ द स्विस एक्सपेडिशन में इसके लेखकर प्रो. अर्नोल्ड हेम और प्रो. आगस्टो गैंसर ने जोशीमठ को लेकर चेतावनी देते हुए कहा था कि यह पूरी तरह पहाड़ों के मलबे पर बसा हुआ है।

मिश्रा कमेटी ने चेताया : 
इसके बाद 1976 में जोशीमठ में लैंडस्लाइड हुआ था। तब तत्कालीन गढ़वाल कमिश्नर महेश चंद्र मिश्रा के नेतृत्व में सरकार ने एक कमेटी गठित की थी। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा था कि जोशीमठ में हो रहे निर्माण कार्यों पर पूरी तरह रोक लगनी चाहिए। हालांकि, प्रशासन ने इस सलाह पर ध्यान नहीं दिया और यहां हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट और सड़कें बनाने का काम चलता रहा। नतीजा आज सबके सामने है।

Share post:

Popular

More like this
Related