प्रयागराज, नागा साधु भारतीय संतों की एक अनूठी श्रेणी हैं, जिनका जीवन रहस्यों से भरा हुआ है। वे अपने समर्पित जीवन को भगवान शिव की भक्ति और तपस्या में व्यतीत करते हैं। महाकुंभ मेले में उनकी उपस्थिति विशेष महत्व रखती है, जहां वे सबसे पहले अमृत स्नान करते हैं। नागा साधु बनने के लिए कठोर तपस्या और कठोर अनुशासन की आवश्यकता होती है, जो उन्हें एक विशेष आध्यात्मिक स्तर पर पहुंचाता है।
भिक्षा का महत्व: नागा साधुओं को क्या दान करें?
नागा साधु जब भिक्षा मांगने आते हैं, तो उन्हें खाली हाथ लौटाना अनुचित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उन्हें भस्म और रुद्राक्ष का दान करना शुभ माना जाता है। ये वस्तुएं भगवान शिव को अर्पित करने के समान हैं। इसके अलावा, खाने की सामग्री या अन्य आवश्यक वस्तुएं भी दी जा सकती हैं, जिनका वे अपने जीवन-यापन के लिए उपयोग करते हैं।
जीवित पिंडदान और समाधि
नागा साधु एक विशेष प्रक्रिया के तहत जीवित रहते हुए ही अपना पिंडदान कर लेते हैं, जिसे सामान्यतः मृत्यु के बाद किया जाता है। उनकी मृत्यु के बाद उन्हें भू या जल समाधि दी जाती है। उनका दाह संस्कार नहीं किया जाता, क्योंकि वे पहले ही सांसारिक जीवन का त्याग कर चुके होते हैं। मृत्यु के बाद उनके शरीर पर भस्म लगाई जाती है और भगवा वस्त्र पहनाए जाते हैं, जो उनके त्याग और तपस्या का प्रतीक है।
जूना अखाड़ा नागा साधुओं का सबसे बड़ा संघ
नागा साधुओं के 13 अखाड़ों में से जूना अखाड़ा सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित है, जिसमें लगभग 5 लाख नागा साधु और महामंडलेश्वर शामिल हैं। ये साधु धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध होते हैं। हाल ही में प्रयागराज महाकुंभ में 5 हजार नए नागा साधुओं का दीक्षा समारोह संपन्न हुआ, जिसमें उन्होंने पिंडदान और अवधूत बनने की प्रक्रिया को अपनाया।
नागा साधुओं का जीवन त्याग, तपस्या और आध्यात्मिक शक्ति का अद्भुत उदाहरण है। उनकी जीवनशैली और धार्मिक समर्पण समाज के लिए प्रेरणादायक है, जो धर्म और संस्कृति के संरक्षण में उनकी भूमिका को महत्वपूर्ण बनाता है।




