नॉर्थ ईस्ट के तीन सूबों में AFSPA के तहत आने वाले क्षेत्र को घटाने का ऐलानः समझिए, क्यों अहम माना जा रहा है यह फैसला

नई दिल्ली, मोदी सरकार ने नॉर्थ ईस्ट के तीन राज्यों में अफस्पा (AFSPA) का दायरा कम करने का फैसला किया है। गृहमंत्री अमित शाह ने इसकी जानकारी दी है। हाल के चुनावों में अफस्पा चुनावी मुद्दा भी बनता दिख रहा था। केंद्र का यह कदम नॉर्थ ईस्ट में शांति बहाली कायम करने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

यहां से हटा- केंद्र ने गुरुवार को पूर्वोत्तर में सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम-1958 को असम के 23 जिलों से पूरी तरह से वापस ले लिया है। वहीं आंशिक रूप से नागालैंड के सात जिलों, मणिपुर के छह जिलों और असम के एक जिले में लागू रहेगा। इन तीन राज्यों के बाकि हिस्सों के साथ-साथ अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों में अफस्पा लागू रहेगा।

फोर्स के अधिकार- अफस्पा के तहत सशस्त्र बलों को व्यापक अधिकार मिलता है। यह कानून उन्हें सीधे गोली चलाने का भी अधिकार देता है। फोर्स को वारंट के बिना व्यक्तियों को गिरफ्तार करने की भी शक्ति देता है। साथ ही सेना बिना वारंट के सर्च भी कर सकती है। पूर्वोत्तर लगभग 60 वर्षों से AFSPA के साये में रह रहा है।

बताया जाता है कि इसके कारण यहां अलगाव की भावना भी पैदा होती रही है। सरकार के इस कदम से इस रीजन को असैन्य बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है। इस कानून के हटने से चेक पॉइंट के माध्यम से लोगों की तलाशी और आवाजाही पर प्रतिबंध हट जाएगा।

अब क्यों हटा- पिछले दो दशकों में, पूर्वोत्तर के विभिन्न हिस्सों में उग्रवाद में कमी देखी गई है। कई प्रमुख अलगाववादी समूह पहले से ही भारत सरकार के साथ बातचीत कर रहे हैं। नागालैंड में सभी प्रमुख समूह- एनएससीएन (आई-एम) और नागा राष्ट्रीय राजनीतिक समूह (एनएनपीजी) सरकार के साथ समझौते के अंतिम चरण में हैं। वहीं मणिपुर में उग्रवाद के साथ-साथ भारी सैन्यीकरण में 2012 के बाद से गिरावट आई है।

क्या था विरोध- अफस्पा के लगने के बाद से मानवाधिकार के उल्लघंन की कई खबरें आईं थीं। कई जगहों पर स्थानीय लोग इस कानून के खिलाफ थे। पिछले कई सालों से सामाजिक कार्यकर्ता इसके खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। जिसमें 2000 में सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने भूख हड़ताल शुरू की थी, जो 16 साल तक जारी रहा। 2004 में, तत्कालीन केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति जीवन रेड्डी के नेतृत्व में एक पांच सदस्यीय समिति का गठन किया था। इस समिति ने 2005 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। जिसमें AFSPA को निरस्त करने की सिफारिश की गई थी। इसे “अत्याधिक अवांछनीय” कहा गया था। समिति ने कहा था कि यह उत्पीड़न का प्रतीक बन गया है”। इसके साथ ही उत्पीड़न को लेकर कई मामले सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित हैं।

कब और क्यों लगा था- जब 1950 के दशक में नागा नेशनल काउंसिल की स्थापना के साथ नागा राष्ट्रवादी आंदोलन शुरू हुआ, तब असम पुलिस बलों ने कथित तौर पर आंदोलन को दबाने के लिए बल का इस्तेमाल किया था। इसके बाद नागालैंड में जैसे ही सशस्त्र आंदोलन ने जड़ें जमाईं, 1958 में अफस्पा को संसद में पारित करके पूरे राज्य में लागू कर दिया गया।

वहीं मणिपुर में भी इसे 1958 में तीन जिलों में लगाया गया था। जिसमें सेनापति, तामेंगलोंग और उखरूल शामिल थे। यह नागा-बहुल जिले थे, जहां एनएनसी सक्रिय थी। इसके बाद इसे 1960 के दशक में चुराचांदपुर के कुकी-ज़ोमी बहुल मणिपुर जिले में लगाया गया था और 1979 में राज्य के बाकी हिस्सों में लागू किया गया। जैसे ही अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में अलगाववादी और राष्ट्रवादी आंदोलन पनपने लगे AFSPA को बढ़ाया और लगाया जाने लगा। धीरे-धीरे इसे असम, त्रिपुरा, मेघालय अरुणाचल प्रदेश के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर में लगा दिया गया।

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