लखनऊ: उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से ठीक पहले बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के भीतर जारी गुटबाजी और नेतृत्व संकट खुलकर सामने आ गया है। मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को दोबारा जिम्मेदारियां सौंपने के लिए उनके ससुर और पूर्व राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ के सामने राजनीति से पूरी तरह ‘संन्यास’ लेने की कड़ी शर्त रख दी है।
मायावती का आरोप है कि सिद्धार्थ की व्यक्तिगत और पारिवारिक महत्वाकांक्षाओं के कारण पार्टी के मिशन को नुकसान पहुंचा है। बहुजन आंदोलन के सामने इस समय आरक्षण जैसे कई गंभीर मुद्दे हैं, लेकिन संगठन की शीर्ष प्राथमिकताओं के स्पष्ट न होने से बहुजन राजनीति के भविष्य पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
आकाश आनंद को 2024 के बाद से कई बार पद से हटाया और पुनः बहाल किया गया है, जिन्हें पिछले सप्ताह ही ‘अपरिपक्व’ बताकर राष्ट्रीय समन्वयक पद से हटाया गया था। चुनावी दहलीज पर खड़े होने के बावजूद बसपा का ध्यान संगठनात्मक मजबूती की बजाय पारिवारिक और अंदरूनी खींचतान पर अधिक केंद्रित दिख रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मायावती की शर्तों और संगठन की अनिश्चितता से जमीनी कार्यकर्ताओं में भ्रम का माहौल बन रहा है। इस सब के बावजूद, बसपा के पास आज भी उत्तर प्रदेश और पड़ोसी राज्यों में एक बेहद मजबूत कैडर आधारित जनाधार है, जो पार्टी को दोबारा एक सशक्त राजनीतिक ताकत बनाने की पूरी क्षमता रखता है। जरूरत इस बात की है कि पार्टी आपसी कलह से उबरकर अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट करे।




