नई दिल्ली: रायटर्स में छपी खबर के मुताबिक, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के इस सप्ताहांत वार्षिक ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए नई दिल्ली आने की संभावना है, जो बीते सात वर्षों में उनकी पहली भारत यात्रा होगी। हालांकि, दो एशियाई दिग्गजों के बीच कूटनीतिक स्तर पर संबंधों में सुधार के संकेत तो दिख रहे हैं, लेकिन द्विपक्षीय व्यापारिक रिश्तों में जल्द किसी बड़े बदलाव के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि कूटनीतिक प्रगति और आर्थिक यथार्थ के बीच एक बड़ी दूरी बनी हुई है।
आधिकारिक व्यापार आंकड़े: वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत-चीन द्विपक्षीय व्यापार 127.7 अरब डॉलर रहा, जिसमें भारत का चीन से आयात 113.5 अरब डॉलर और निर्यात घटकर 14.3 अरब डॉलर दर्ज किया गया। इसके परिणामस्वरूप दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा रिकॉर्ड 99.2 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जो मुख्य रूप से भारतीय उद्योग की चीनी इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक घटकों पर निर्भरता को दर्शाता है।
दोनों देशों के व्यवसायों को आज भी सख्त नियामक तंत्र, निवेश में देरी, वीजा में अड़चनों और औद्योगिक उपकरणों पर लगी पाबंदियों जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
रायटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, बीजिंग ने फिलहाल इस दौरे की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है और न ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ किसी द्विपक्षीय बैठक का आधिकारिक ब्यौरा सामने आया है। वर्ष 1962 के युद्ध के बाद से ही दोनों देशों के बीच अविश्वास का माहौल रहा है, जो 2020 की सीमा हिंसक झड़प के बाद बेहद तल्ख हो गया था।
उस हिंसक संघर्ष में 20 भारतीय और चार चीनी सैनिक मारे गए थे, जिसके बाद से दोनों पक्षों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया था। हालांकि, पिछले साल प्रधानमंत्री मोदी की चीन यात्रा और अमेरिका के साथ बदलती वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच हाल के दिनों में रिश्तों में जमी बर्फ कुछ हद तक जरूर पिघली है। फिर भी व्यापारिक जगत अब भी ठोस फैसलों का इंतजार कर रहा है।




