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ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव: CEC को हटाने की प्रक्रिया क्या है और क्या विपक्ष एकजुट होगा?

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव: CEC को हटाने की प्रक्रिया क्या है और क्या विपक्ष एकजुट होगा?

पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की राजनीति गरमा गई है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसद में महाभियोग का नोटिस दिया है। यह नोटिस लोकसभा और राज्यसभा दोनों में दिया गया है और इसमें चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। बताया जा रहा है कि यह नोटिस करीब 10 पन्नों का है, जिसमें सात प्रमुख आरोप शामिल हैं। तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि बिहार और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए और कुछ राजनीतिक दलों के पक्ष में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया गया। भारत में यह पहला मौका है जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के खिलाफ महाभियोग का नोटिस दिया गया है।

महाभियोग नोटिस के बाद क्या होगी प्रक्रिया?

अगर तृणमूल कांग्रेस द्वारा दिया गया नोटिस वैध पाया जाता है, तो आगे की प्रक्रिया संसद के दोनों सदनों में शुरू होगी। इसके तहत लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा के सभापति मिलकर एक तीन सदस्यीय जांच समिति गठित कर सकते हैं। हालांकि इसके लिए पहले संसद में आवश्यक समर्थन होना जरूरी है। नियमों के मुताबिक महाभियोग प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस नोटिस पर लोकसभा के करीब 130 सांसदों और राज्यसभा के 63 सांसदों के हस्ताक्षर बताए जा रहे हैं।

यदि नोटिस स्वीकार कर लिया जाता है, तो जांच के लिए गठित समिति में आमतौर पर:

  • सुप्रीम कोर्ट का एक जज
  • किसी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश
  • एक वरिष्ठ वकील या विधि विशेषज्ञ

शामिल किए जाते हैं। यह समिति लगाए गए आरोपों की जांच करती है और तय करती है कि महाभियोग का मामला बनता है या नहीं।

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया

भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना बेहद कठिन प्रक्रिया मानी जाती है। संविधान के अनुसार CEC को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने जैसी ही होती है।

संविधान के अनुच्छेद 124(4) के तहत किसी भी संवैधानिक पदाधिकारी को हटाने के लिए दो आधार बताए गए हैं:

  • सिद्ध कदाचार (Misbehaviour)
  • कार्य करने में असमर्थता (Incapacity)

अगर जांच समिति आरोपों को सही पाती है, तो संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाया जाता है। इसके बाद इसे पास कराने के लिए दोनों सदनों में विशेष बहुमत (Special Majority) की जरूरत होती है।

क्या विपक्ष प्रस्ताव पास करा पाएगा?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद में इस समय विपक्ष के पास उतनी संख्या नहीं है कि वह आसानी से महाभियोग प्रस्ताव पास करा सके। इसलिए यह प्रस्ताव पास होना फिलहाल मुश्किल माना जा रहा है। हालांकि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले इस मुद्दे को उठाकर ममता बनर्जी विपक्ष को एकजुट करने और चुनाव आयोग पर सवाल खड़े करने की रणनीति अपना रही हैं। इससे पहले भी इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बहस हो चुकी है।

राजनीतिक संदेश क्या है?

विशेषज्ञों का मानना है कि महाभियोग प्रस्ताव का राजनीतिक महत्व भी है। इसके जरिए तृणमूल कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि वह चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रही है और चुनाव से पहले इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में लाना चाहती है। कुल मिलाकर, ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिया गया महाभियोग नोटिस भारतीय संसदीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। अब देखना होगा कि संसद की प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ती है और क्या विपक्ष इस मुद्दे पर एकजुट हो पाता है या नहीं।

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