नई दिल्ली, रूस और यूक्रेन जंग के बीच यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इस युद्ध के लिए अमेरिका कितना दोषी है। दरअसल, रूसी राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन यह कहते रहे हैं कि अमेरिका ने नब्बे के दशक में वादा किया था कि सुदूर पूर्व में नाटो का विस्तार नहीं करेगा। लेकिन अमेरिका ने अपने इस वादे को नहीं निभाया। आखिर पुतिन किस वादे की बात कर रहे हैं। आइये आपको बताते हैं.
दरअसल, रूसी राष्ट्रपति पुतिन लंबे समय से यह दावा करते आए हैं कि अमेरिका ने नब्बे के दशक में वादा किया था कि सुदूर पूर्व में वह नाटो का विस्तार नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि लेकिन अमेरिका ने अपने इस वादे को तोड़ दिया है। पुतिन ने कहा कि अमेरिका ने रूस को निराश किया है। हालांकि, सावियत संघ के नेता मिसाइल गोर्बाचेव से इस बारे में क्या वादा किया गया था इसे लेकर दोनों पक्षों के मध्य मतभेद है। बता दें कि पूर्व सोवियत संघ के कभी सदस्य या उसके प्रभाव में रहे कई पूर्वी और मध्य यूरोपीय देश आज नाटो का हिस्सा बन चुके हैं। इनमें से चार देशों- पोलैंड, लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया की सीमाएं रूस से लगती हैं। रूस यह कहता रहा है कि नाटो के विस्तार और उसकी सीमा के पास नाटो की सेनाओं और सैन्य उपकरणों के रहने से रूस की सुरक्षा को सीधा खतरा है।
पुतिन का तर्क रहा है कि यूक्रेन पूर्ण रूप से कभी एक देश नहीं था। उन्होंने सदैव यूक्रेन पर पश्चिमी देशों की कठपुतली बनने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि पुतिन अमेरिका और पश्चिमी देशों से यह सुनिश्चित कराना चाहते थे कि यूक्रेन को कभी नाटो का हिस्सा नहीं बनाया जाए। वह इस बात की अमेरिका और पश्चिमी देशों से गारंटी भी चाहते थे। पुतिन ने कई बार कहा है कि यूक्रेन को अपना सैन्यीकरण बंद करना चाहिए और उसको वह किसी गुट का हिस्सा नहीं बने। हालांकि, यूक्रेन पुतिन की इस मांग का सदैव विरोध करता रहा है। इसके लिए पुतिन अमेरिकी प्रशासन और पश्चिमी देशों को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं।
क्या है नाटो संगठन
द नार्थ अटलांटिक ट्रिटीर्गनाइजेशन यानी (नाटो) एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है। वर्ष 1949 में 28 यूरोपीय देशों और दो उत्तरी अमेरिकी देशों के बीच बनाया गया था। नाटो का उद्देश्य राजनीतिक और सैन्य साधनों के माध्यम से अपने सदस्य देशों को स्वतंत्रता और सुरक्षा की गारंटी देना है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद यह संगठन अस्तित्व में आया। नाटो का मुख्यालय ब्रुसेल्स, बेल्जियम में स्थित है।
नाटो की मान्यता है कि संगठन के किसी भी एक देश पर आक्रमण पूरे संगठन पर हमला माना जाएगा। यानी किसी के एक देश पर आक्रमण का जवाब नाटो के सभी देश मिलकर देंगें। नाटो की अपनी कोई सेना या अन्य कोई रक्षा सूत्र नहीं है, बल्कि नाटो के सभी सदस्य देश आपसी समझ के आधार पर अपनी-अपनी सेनाओं के साथ योगदान देगें।
बता दें कि केवल नाटो के सदस्य देश ही उसके संरक्षण का लाभ ले सकते हैं। अन्य देश जो नाटो के सदस्य नहीं हैं उनके प्रति नाटो की कोई जवाबदेही नहीं होगी। नाटो अपने सदस्य देशों पर किसी भी बाहरी आक्रमण से बचाव के प्रति जवाबदेह है, लेकिन यदि किसी सदस्य देश में सिविल या कोई अन्य हमला होता है तो नाटो की उसमें शून्य भागीदारी होगी।
नाटो की फंडिंग उसके सदस्य देशों द्वारा ही की जाती है। अमेरिका को नाटो की फंडिंग का बैकबोन कहा जाता है। नाटो के बजट का तीन-चौथाई भाग अमेरिका देता है। 2020 में नाटो के सभी सदस्यों का संयुक्त सैन्य खर्च विश्व के कुल खर्च का 57 फीसद था। 1949 में नाटो के मूल सदस्य बेल्जियम, कनाडा, डेनमार्क, फ्रांस, आइसलैंड, इटली, लक्जमबर्ग, नीदरलैंड, नॉर्वे, पुर्तगाल, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका थे, लेकिन अब सदस्य देशों की संख्या 30 के करीब पंहुच गई है।




