नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर दायर याचिकाओं पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) सहित कई संगठनों ने इस नियुक्ति को चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 2023 में संविधान पीठ द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन नहीं किया गया है। अदालत में याचिका पर वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण पक्ष रखेंगे।
संविधान पीठ के निर्देशों का उल्लंघन?
पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने निर्देश दिया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक समिति द्वारा की जाएगी, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधान न्यायाधीश शामिल होंगे। हालांकि, हाल ही में बनाए गए नए कानून में प्रधान न्यायाधीश को इस प्रक्रिया से बाहर रखा गया है। इस संशोधित प्रक्रिया के तहत ज्ञानेश कुमार को नया मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया है। विपक्ष और नागरिक संगठनों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है।
ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति पर विवाद
सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की अध्यक्षता वाली चयन समिति की बैठक में ज्ञानेश कुमार को सीईसी के रूप में नियुक्त किया गया। हालांकि, विपक्षी दलों ने इस प्रक्रिया को “मनमानी” करार देते हुए इसकी आलोचना की है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस नियुक्ति को लेकर कहा कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों की अनदेखी की है।
पहले CEC बने जो नए कानून के तहत नियुक्त हुए
ज्ञानेश कुमार निर्वाचन आयोग के नए कानून के तहत नियुक्त होने वाले पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त हैं। उन्होंने बुधवार को अपना पदभार ग्रहण कर लिया। उनका कार्यकाल 26 जनवरी, 2029 तक रहेगा, जिसके बाद अगले आम चुनावों की घोषणा हो सकती है। उनके साथ ही हरियाणा कैडर के 1989 बैच के आईएएस अधिकारी विवेक जोशी को नया चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया है, जिनका कार्यकाल 2031 तक रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी निगाहें
सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई बेहद अहम मानी जा रही है, क्योंकि यह मामला देश में निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। यदि अदालत याचिकाकर्ताओं के पक्ष में निर्णय देती है, तो सरकार की नियुक्ति प्रक्रिया पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है। दूसरी ओर, यदि अदालत सरकार के पक्ष में जाती है, तो नए कानून के तहत नियुक्तियों को संवैधानिक वैधता मिल सकती है।
अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और उसके फैसले पर टिकी हैं, जो देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए एक मिसाल कायम कर सकता है।




