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राणा यशवंत सधी ज़ुबान, साफ समझ और खबरों की नब्ज़ पर बारीक़ पकड़ के धुरंधर पत्रकार हैं . खबर के विश्लेषण को आम आदमी की समझ तक ले जाना और उसे रखने के अलग अंदाज़ के चलते यशवंत टीवी पत्रकारिता का एक बहुत मज़बूत स्तंभ माने जाते रहे हैं. नए आइडिया और खबरों के ट्रीटमेंट में उन्हें बेजोड़ तो माना ही जाता है, बेहतरीन टीम मैनेजमेंट, शानदार लीडरशिप और जुनून की हद तक काम करने के लिए यशवंत को खासतौर पर जाना जाता है. राणा यशवंत जब ग्राउंड से रिपोर्ट करते हैं या फिर किसी विषय पर बहस करते हैं तो टीवी की उनकी समझ और विषय की जानकारी किसी को भी प्रभावित कर सकती है. पत्रकारिता में महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें रेडइंक अवॉर्ड, भारतीय मानवाधिकार सम्मान और राजीव गांधी ग्लोबल एक्सेलेंस अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है. इसके अलावा उन्हें बतौर पत्रकार दर्जनों सम्मान व पुरस्कार मिल चुके हैं। यशवंत ज़ी न्यूज़, आज तक, महुआ, इंडिया न्यूज़ जैसे प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनलों में बड़े ओहदों पर रह चुके हैं. यशवंत को गंभीर मुद्दों पर डॉक्यूमेंट्री बनाने में भी महारत हासिल है. आजतक में उनके समय बनी बहुचर्चित डॉक्यूमेंट्रीज ‘करगिल के दस साल’ और ’26/11 जो हमने देखा’ की चर्चा आज भी होती है। 2007 के ट्वेंटी-20 विश्व कप में “क्रिकेट कैफे” जैसा प्रयोग, आरुषि हत्याकांड में लंबी सीरीज आदि के लिये उन्हें काफी सराहना मिल चुकी है। भाषा के धनी राणा यशवंत की पकड़ साहित्य-संस्कृति पर खासी मजबूत मानी जाती है। उनका काव्य संग्रह “अंधेरी गली का चांद” अपने विषय और शिल्प के चलते हिंदी के शीर्ष कवियों की तारीफ बटोर चुका है. उनकी नज़्मों का एलबम ‘दरमियाँ’ भी रिलीज़ हो चुका है, जिसके ज़रिए उनकी काबिलियत का एक और चेहरा सामने आया है. हाल ही में राणा यशवंत को राजवल्लभ साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.