मुजफ्फरनगर का नाम बदलकर लक्ष्मीनगर? 2027 चुनाव से पहले गरमाई सियासत

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले का नाम बदलकर लक्ष्मीनगर करने की मांग एक बार फिर राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गई है। बीजेपी एमएलसी मोहित बेनीवाल ने विधान परिषद में यह मुद्दा उठाते हुए इसे सांस्कृतिक और आर्थिक प्रगति से जोड़ा। इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर इस मांग को दोहराया।

बीजेपी इस मुद्दे के जरिए 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिमी यूपी में सियासी माहौल तैयार करने की रणनीति बना रही है। जिला पंचायत अध्यक्ष डॉ. वीरपाल निर्वाल भी 12 मार्च को होने वाली बोर्ड बैठक में नाम बदलने का प्रस्ताव पेश करने की तैयारी कर रहे हैं। प्रस्ताव पास होने के बाद इसे राज्य सरकार के पास भेजा जाएगा।

42 साल पुराना मुद्दा फिर से चर्चा में
मुजफ्फरनगर का नाम बदलने की मांग कोई नई नहीं है। 1983 में आरएसएस ने राम मंदिर आंदोलन के दौरान लक्ष्मीनगर नामकरण का अभियान चलाया था। संघ और बीजेपी के नेता लंबे समय तक पत्राचार और पोस्टकार्ड पर लक्ष्मीनगर नाम का इस्तेमाल करते रहे। हालांकि, यह मांग कभी हकीकत नहीं बन पाई।

मुजफ्फरनगर का ऐतिहासिक नाम मुगल बादशाह शाहजहां के सरदार सैय्यद मुजफ्फर खान के नाम पर पड़ा था। 1633 में उन्होंने इस शहर की स्थापना की थी और उनके बेटे मुन्नवर लश्कर खान ने अपने पिता की याद में इसका नाम मुजफ्फरनगर रखा।

बीजेपी की सियासी रणनीति
बीजेपी पश्चिमी यूपी में 2027 चुनाव के लिए हिंदुत्व और सांस्कृतिक पहचान के मुद्दे को फिर से हवा देना चाहती है। इससे पहले 2013 के दंगों और 2017 में कैराना पलायन के मुद्दे को उछालकर पार्टी को राजनीतिक लाभ मिला था। लेकिन 2022 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनावों में पश्चिमी यूपी में बीजेपी को झटका लगा।

मुजफ्फरनगर, कैराना और सहारनपुर जैसी सीटों पर हार के बाद बीजेपी को नए मुद्दों की तलाश है। ऐसे में नाम बदलने का मुद्दा हिंदू वोटरों को एकजुट करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

क्या बदलेगा मुजफ्फरनगर का नाम?
हालांकि, प्रशासनिक स्तर पर अभी तक इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। लेकिन बीजेपी नेताओं के समर्थन और जिला पंचायत में प्रस्ताव लाने की तैयारी से यह स्पष्ट है कि आने वाले महीनों में यह मुद्दा और गर्माएगा।

अब देखना होगा कि क्या बीजेपी इस मुद्दे के जरिए पश्चिमी यूपी में अपनी सियासी स्थिति मजबूत कर पाएगी या फिर यह सिर्फ एक चुनावी रणनीति बनकर रह जाएगा।

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