बुलडोजर ही नहीं…हथौड़े से लेकर चरखा भी बन चुका है सियासी हथियार, जानिए- कब कैसे किस पॉलिटिकल टूल का हुआ इस्तेमाल

नई दिल्ली, देश में इन दिनों बुलडोजर के साथ लाउडस्पीकर को लेकर सियासी घमासान मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बाद अब दिल्ली में बुलडोजर से ढहाए जा रहे अवैध निर्माण और अतिक्रमण को लेकर जमकर सियासत होती दिखाई दे रही है। पिछले दिनों लाडउस्पीकर को लेकर इसी तरह सियासी पारा चढ़ा हुआ था जब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने राज्य सरकार को चेतावनी देते हुए मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने की मांग की थी। ये पहला मौका नहीं है जब देश में बुलडोजर और लाउडस्पीकर जैसी चीजों का राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल हुआ है। इसके पहले, चरखा और हथौड़े का भी पॉलिटिकल टूल के तौर इस्तेमाल हो चुका है।

लाउडस्पीकर: मंदिरों और मस्जिदों पर लगे लाउडस्पीकर को लेकर ये सियासी बयानबाजी तो जारी थी, लेकिन इसको लेकर राजनीति मनसे प्रमुख राज ठाकरे के बयान के बाद और भी तेज हो गई। ठाकरे ने उद्धव सरकार को चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर मस्जिदों से लाउडस्पीकर नहीं हटाए गए तो उनकी पार्टी के कार्यकर्ता मस्जिदों के सामने लाउडस्पीकर बजाकर हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे। इस बयान के बाद कई दिनों तक महाराष्ट्र में घमासान मचा रहा। इसके बाद उत्तर प्रदेश में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए अलग-अलग जिलों में मंदिर-मस्जिद से लाउडस्पीकर हटाए गए।

बुलडोजर: उत्तर प्रदेश में भूमाफियों के खिलाफ जमकर बुलडोजर चला और इसका असर ऐसा था कि विधानसभा चुनाव के दौरान सीएम योगी को ‘बुलडोजर बाबा’ कहा जाने लगा। माफियाओं और अन्य अपराधियों के खिलाफ यूपी में पुलिस ने बुलडोजर का खूब इस्तेमाल किया। इसी तरह, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान सरकार ने दंगाइयों की संपत्ति पर बुलडोजर चलाया।

चरखा: 1862 के आसपास, ब्रिटेन में 67% कॉटन बेहद सस्ते दामों पर भारत से मैनचेस्टर भेजे जा रहे थे और वहां की मशीनों से बनकर आने वाले कपड़े काफी सस्ते होते थे, जिससे मार्केट में इसकी डिमांड बढ़ने लगी। इसका विपरीत असर भारत पर पड़ने लगा था। इसके बाद महात्मा गांधी ने विदेशी कपड़े के बहिष्कार का अभियान चलाया और उन्होंने लोगों को चरखे से बने खादी के कपड़े पहनने का आह्वान किया।

दरांती-हथौड़ा: 1917 से 1923 तक चले रूसी क्रांति के समय से हथौड़ा और दरांती कम्युनिज्म का प्रतीक रहा है। हथौड़ा कारखानों में काम करने वालों का प्रतीक है, जबकि दरांती को किसानों के चिन्ह के तौर पर लिया गया। इसके बाद, दरांती-हथौड़े को पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल किया गया। वर्तमान में सभी वामदल हथौड़े और दरांती का प्रतीक चिन्ह इस्तेमाल करते हैं।

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