मीडिया सूत्रों के मुताबिक दोनों नेताओं के बीच हाल के चुनावों और यूपी समेत चार राज्यों में भाजपा की दोबारा ताजपोशी को लेकर चर्चाएं हुईं हैं। साथ ही दोनों नेताओं ने हाल के घटनाक्रमों, बंगाल हिंसा, विपक्षी एकता जैसे मुद्दों पर आपस में बातें कीं।
2019 से पहले दो दशक से ज्यादा समय तक भाजपा की सहयोगी रही शिव सेना ने महाराष्ट्र में पिछले विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने को लेकर हुए मतभेद के बाद अलग हो गई थी। तब से शिवसेना विभिन्न मुद्दों पर भाजपा पर हमलावर रहती है। शिवसेना ने अपने कट्टर हिंदुत्व रवैये से अलग हटकर महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर अपने नेता उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में महा विकास आघाड़ी (एमवीए) सरकार बनाई और भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर मुखर हो गई है।
इधर, वरुण गांधी की भाजपा में पहले युवा और तेज तर्रार नेता के रूप में गिनती होती थी। उन्हें पार्टी ने 2013 में सबसे कम उम्र का महासचिव भी बनाया था। बाद में वे पश्चिम बंगाल जैसे राज्य के प्रभारी बनाए गए थे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से उनका रुख पार्टी के लिए ही संकट खड़ा करने वाला हो गया है। कभी वे केंद्र को किसान विरोधी बताते हुए भाजपा नेतृत्व पर हमला करते हैं तो कभी वे लखीपुर खीरी में हुए बवाल के लिए अपनी पार्टी के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंकने लगते है।
पीएम मोदी की नीतियों के खिलाफ भी वे सार्वजनिक रूप से बयान देते रहते हैं। उनके बयानबाजी और भाजपा विरोधी रवैए की वजह से ही पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने अक्टूबर 2021 में वरुण गांधी और उनकी मां मेनका गांधी को अपनी टीम से बाहर करते हुए कड़ा संदेश दिया था। इस बीच संजय राउत के साथ उनकी मुलाकात में क्या चर्चाएं हुईं और दोनों नेताओं ने किन मुद्दों पर आपस में बातचीत की, इसको लेकर कोई भी बयान जारी नहीं किया गया है।




