पटना: बिहार विधान परिषद की पटना स्नातक सीट का चुनाव अब सिर्फ जेडीयू के नीरज कुमार और जन सुराज के अनुज सिंह के बीच मुकाबला नहीं रह गया है। इस चुनाव ने जेडीयू के भीतर चल रही एक पुरानी राजनीतिक खींचतान को भी सामने ला दिया है। मोकामा से जेडीयू विधायक अनंत सिंह ने अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया है और जन सुराज के उम्मीदवार डॉ. अनुज सिंह को समर्थन देने का ऐलान किया है। अनंत सिंह का समर्थन सिर्फ बयान तक सीमित नहीं है। अनुज सिंह के नामांकन के मौके पर उनके आवास पर 50 हजार रसगुल्ले तैयार करवाए गए हैं। इन्हें नामांकन में पहुंचने वाले समर्थकों और आम लोगों के बीच बांटने की तैयारी है। यानी अनंत सिंह ने अपने समर्थन को एक बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम का रूप देने की तैयारी की है।
लेकिन इस पूरी कहानी में असली सवाल रसगुल्लों से बड़ा है। सवाल यह है कि आखिर अनंत सिंह अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ इतनी मजबूती से क्यों खड़े हैं? जेडीयू के वरिष्ठ नेता सुलह की कोशिश कर चुके हैं, मामला नीतीश कुमार और शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच चुका है, फिर भी अनंत सिंह पीछे क्यों नहीं हट रहे? और क्या अब उनका निशाना सिर्फ नीरज कुमार को चुनाव हराना है?
50 हजार रसगुल्ले क्यों? अनंत सिंह ने क्या संदेश दिया?
अनुज सिंह 1 अक्टूबर को पटना स्नातक सीट से नामांकन दाखिल कर रहे हैं। इसी मौके पर अनंत सिंह के आवास पर 50 हजार रसगुल्ले तैयार करवाए गए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, नामांकन के दौरान समर्थकों और आम लोगों के बीच इनका वितरण किया जाएगा। सियासत में किसी नामांकन के दौरान मिठाई बांटना नई बात नहीं है, लेकिन यहां संख्या और राजनीतिक संदर्भ दोनों इसे खास बना रहे हैं। क्योंकि रसगुल्ले उस नेता के घर से आ रहे हैं, जो अपनी ही पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ दूसरे दल के प्रत्याशी के साथ खड़ा है। अनंत सिंह पहले ही अनुज सिंह के समर्थन का ऐलान कर चुके हैं। ऐसे में 50 हजार रसगुल्लों को उनके समर्थन के सार्वजनिक प्रदर्शन के तौर पर देखा जा रहा है। यानी संदेश यह है कि अनंत सिंह सिर्फ बयान देकर पीछे हटने वाले नहीं हैं, बल्कि वह चुनावी मैदान में अनुज सिंह के साथ सक्रिय रूप से खड़े होने का संकेत दे रहे हैं।
अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच आखिर विवाद क्या है?
इस पूरे विवाद की जड़ अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच लंबे समय से चली आ रही तनातनी में बताई जा रही है। दोनों नेताओं के बीच विवाद पहले भी सामने आता रहा है, लेकिन पटना स्नातक सीट के चुनाव ने इसे खुली राजनीतिक लड़ाई में बदल दिया है। अनंत सिंह का आरोप है कि नीरज कुमार ने उनके खिलाफ पहले भी राजनीतिक तौर पर काम किया और उन्हें नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। उन्होंने पुराने मामलों और चुनावी घटनाओं का जिक्र करते हुए नीरज कुमार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। दूसरी तरफ नीरज कुमार ने अनंत सिंह के आरोपों को खारिज किया है। उन्होंने कहा है कि अगर अनंत सिंह के पास उनके खिलाफ कोई सबूत है तो उन्हें अदालत जाना चाहिए। यानी दोनों नेताओं के बीच विवाद केवल टिकट या इस एमएलसी चुनाव तक सीमित नहीं है। इसके पीछे पुरानी राजनीतिक तनातनी भी है।

अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ क्यों खड़े हुए अनंत सिंह?
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल है। नीरज कुमार जेडीयू के आधिकारिक उम्मीदवार हैं। इसके बावजूद जेडीयू विधायक अनंत सिंह उनके खिलाफ जन सुराज के अनुज सिंह का समर्थन कर रहे हैं। अनंत सिंह के रुख को समझने के लिए उनके और नीरज कुमार के पुराने विवाद को देखना जरूरी है। रिपोर्टों के मुताबिक, अनंत सिंह लगातार यह कहते रहे हैं कि उनका विरोध जेडीयू से नहीं, बल्कि नीरज कुमार से है। यही वजह है कि पार्टी की ओर से समझाने की कोशिश के बावजूद वह नीरज के खिलाफ अपना रुख बदलने को तैयार नहीं हुए। जेडीयू ने दोनों नेताओं के बीच विवाद खत्म कराने की कोशिश भी की। सितंबर में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं श्रवण कुमार और उमेश कुशवाहा को सुलह कराने की जिम्मेदारी दिए जाने की रिपोर्ट सामने आई थी। लेकिन बैठक से कोई स्पष्ट समाधान नहीं निकला।

नीतीश कुमार चुप क्यों ?
यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि अनंत सिंह और नीरज कुमार का विवाद अब जेडीयू के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच चुका है। पार्टी के नेताओं ने माना है कि मामले की जानकारी बड़े नेताओं को है। जेडीयू नेता श्रवण कुमार ने भी कहा है कि विवाद पार्टी के बड़े नेताओं के संज्ञान में है और उचित समय पर इसका समाधान किया जाएगा।] लेकिन यहां एक बात साफ रखना जरूरी है। नीतीश कुमार की ओर से इस विवाद पर कोई सार्वजनिक फैसला या विस्तृत बयान सामने नहीं आया है। इसलिए यह कहना कि नीतीश कुमार “अनंत सिंह की बात नहीं मान रहे” या उन्होंने कोई आदेश दिया है, अभी सही नहीं होगा।

असल सवाल यह है कि जब पार्टी के भीतर सुलह की कोशिश हो चुकी है और मामला शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच चुका है, तब भी अनंत सिंह अपने रुख पर कायम क्यों हैं? यही इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प राजनीतिक पहलू है। जेडीयू के सामने अब दो रास्ते दिखाई देते हैं या तो बातचीत के जरिए अनंत सिंह को मनाने की कोशिश जारी रहे, या फिर पार्टी अनुशासन के स्तर पर कोई फैसला लिया जाए। फिलहाल सार्वजनिक रूप से किसी अंतिम कार्रवाई की घोषणा नहीं हुई है।
क्या नीरज को हराकर ही मानेंगे अनंत सिंह?
अनंत सिंह के मौजूदा बयानों और उनके कदमों को देखें तो यह सवाल स्वाभाविक है। उन्होंने न सिर्फ अनुज सिंह को समर्थन दिया है, बल्कि उनके लिए चुनाव प्रचार करने की बात भी कही है। रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने पटना स्नातक क्षेत्र के 26 विधानसभा क्षेत्रों में प्रचार करने की बात कही है। इतना ही नहीं, रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि अनंत सिंह ने नीरज कुमार को चुनाव में हराने का खुला ऐलान किया है। इसके बाद यह चुनाव दोनों उम्मीदवारों की लड़ाई से आगे बढ़कर दोनों नेताओं के बीच प्रतिष्ठा के टकराव के तौर पर भी चर्चा में आ गया है। हालांकि, यहां एक सीमा साफ है। यह कहना अभी संभव नहीं है कि अनंत सिंह का समर्थन चुनाव का नतीजा तय कर देगा। एमएलसी की स्नातक सीट का चुनाव विधानसभा चुनाव से अलग होता है और इसका मतदाता वर्ग भी अलग है। इसलिए असली तस्वीर मतदान और मतगणना के बाद ही सामने आएगी। लेकिन राजनीतिक तौर पर अनंत सिंह ने अपना रुख काफी स्पष्ट कर दिया है। वह नीरज कुमार के खिलाफ हैं और अनुज सिंह के समर्थन में हैं।

नीरज कुमार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
नीरज कुमार के पास जेडीयू का आधिकारिक समर्थन है। लेकिन उनके खिलाफ उनकी ही पार्टी के एक विधायक का खुला विरोध इस चुनाव को सामान्य मुकाबले से अलग बना रहा है। दूसरी तरफ अनुज सिंह के पास जन सुराज का संगठन और अनंत सिंह का समर्थन है। ऐसे में दोनों उम्मीदवारों के सामने अपनी-अपनी रणनीति को जमीन पर उतारने की चुनौती होगी। नीरज कुमार के लिए चुनौती यह होगी कि पार्टी के आधिकारिक समर्थन को मजबूत चुनावी अभियान में बदला जाए। वहीं अनुज सिंह के लिए चुनौती यह होगी कि अनंत सिंह के समर्थन को स्नातक मतदाताओं के बीच कितना प्रभावी बनाया जा सकता है।

अब असली परीक्षा किसकी?
पटना स्नातक सीट का यह चुनाव अब कई स्तरों पर देखा जा रहा है। एक तरफ नीरज कुमार और अनुज सिंह के बीच सीधा चुनावी मुकाबला है। दूसरी तरफ अनंत सिंह ने इसे अपने पुराने राजनीतिक विवाद से जोड़ दिया है। और तीसरा सवाल जेडीयू नेतृत्व का है। क्या पार्टी इस विवाद को चुनाव से पहले सुलझा पाएगी या अनंत सिंह का विरोध मतदान तक जारी रहेगा? 23 अक्टूबर को मतदान और 27 अक्टूबर को मतगणना के बाद तस्वीर साफ होगी। तब यह भी पता चलेगा कि अनंत सिंह का खुला समर्थन अनुज सिंह के लिए कितना असरदार रहा और नीरज कुमार के खिलाफ उनकी मुहिम का चुनावी असर कितना पड़ा। फिलहाल 50 हजार रसगुल्लों की कहानी सिर्फ मिठाई बांटने की कहानी नहीं है। यह उस राजनीतिक टकराव का प्रतीक बन गई है, जिसमें एक तरफ जेडीयू का आधिकारिक उम्मीदवार नीरज कुमार है, दूसरी तरफ जन सुराज के अनुज सिंह हैं और उनके समर्थन में जेडीयू विधायक अनंत सिंह खुलकर खड़े हैं।




