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कोलकाता, 26 फरवरी 2021

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान से ठीक पहले ममता बनर्जी की परेशानी और बढ़ गई है। अब पार्टी के प्रभावशाली मुस्लिम विधायक सिद्दीकुल्लाह चौधरी ने अपनी मंगलकोट सीट से दोबारा चुनाव लड़ने से हाथ खड़े कर दिए हैं। सिद्दीकुल्लाह चौधरी नंदीग्राम भूमि-अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के एक प्रमुख चेहरा थे,लेकिन इसबार वो पूर्वी बर्दवान जिले की अपनी मंगलकोट सीट से चुनाव नहीं लड़ना चाहते। उन्होंने उस सीट से चुनाव नहीं लड़ने के कारणों की जानकारी मुख्यमंत्री और पार्टी सुप्रीमो तक भी पहुंचा दी है।

ममता के विधायक क्यों नहीं लड़ना चाहते चुनाव?

चौधरी ने मंगलकोट सीट से दोबारा चुनाव लड़ने से इनकार करने की वजह पार्टी के जिला नेतृत्व का ‘उदासीन बर्ताव’ और वहां पार्टी के ‘असंगठनात्मक तरीके से काम करने’ और ‘शिष्टाचार की कमी’ बताया है। उन्होंने अपने फैसले के बारे में कहा है, ‘मैंने अपनी पार्टी के जिला नेतृत्व की कमजोरी के बारे में पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी को सबकुछ बता दिया है। मुझे लगता है कि जिले के कुछ पार्टी नेता इस कठिन चुनाव में उस तरह से काम नहीं कर रहे हैं, जैसा कि उन्हें करना चाहिए। ‘ ठीक चुनाव से पहले चौधरी का कहना है कि वो बर्दवान के भूमिपुत्र हैं और कमजोर नेतृत्व के चलते वह जिले को विकास के पथ पर पिछड़ता देख आंख मूंदे नहीं रह सकते। ‘इसलिए मैंने फैसला किया है इसबार मंगलकोट से चुनाव नहीं लड़ूंगा। मैंने अपनी पार्टी चीफ को पहले ही अपना फैसला बता दिया है।’

कांग्रेस से टीएमसी में आए थे चौधरी

2016 के विधानसभा चुनाव में सिद्दीकुल्लाह चौधरी ने इसी सीट से सीपीएम के साहजहां चौधरी के करीब 12,000 वोटों से हराया था। तब ममता ने उन्हें मंत्री बनाया था और जन संचार, पुस्तकालय और संसदीय कार्य राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) का कार्यभार दिया था। ये 1984 में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़े थे और 2014 में टीएमसी में आकर बशीरहाट संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़े थे। वैसे ‘दीदी’ के लिए राहत की बात ये हो सकती है कि पार्टी के बाकी नेताओं की तरह इन्होंने दूसरे नेताओं से परेशानी की वजह से पार्टी छोड़ने का फैसला नहीं किया है, जैसे कि पिछले कुछ समय से कई नेता टीएमसी को टाटा कह चुके हैं और उनमें से अधिकतर भाजपा में शामिल हो चुके हैं।