समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में अशोक ‘मिज़ाज़’ का नाम उस रचनात्मक चेतना के रूप में उभरता है, जो दिखावे से दूर रहकर अपने समय से सीधी मुठभेड़ करती है। उनकी कविता किसी मंचीय घोषणा की तरह नहीं आती, बल्कि जीवन के बीचों-बीच खड़ी होकर सवाल उठाती है। आज उनके जन्मदिवस के अवसर पर यह कहना और भी सार्थक हो जाता है कि वे शब्दों के ज़रिये पाठक को चकित करने के बजाय उसे सोचने पर मजबूर करते हैं, और यही उनकी रचनात्मक पहचान की सबसे बड़ी ताक़त है।
अशोक ‘मिज़ाज़’ की कविताओं में सादगी कोई कमजोरी नहीं, बल्कि एक गहरा सौंदर्यबोध है। वे कठिन शब्दावली या जटिल बिम्बों के सहारे कविता को बोझिल नहीं बनाते। उनकी पंक्तियाँ आम ज़िंदगी से उठती हैं—कामकाजी आदमी की थकान, टूटते रिश्तों की ख़ामोशी, समाज में बढ़ती असमानता और उम्मीद की वह लौ जो हर मुश्किल के बीच जलती रहती है। यही वजह है कि उनकी कविता पाठक को किसी अलग दुनिया में नहीं ले जाती, बल्कि उसे अपने ही अनुभवों से रू-बरू कराती है।
उनकी रचनाओं में सामाजिक सरोकार साफ़ दिखाई देते हैं, लेकिन वे नारेबाज़ी से खुद को अलग रखते हैं। अशोक ‘मिज़ाज़’ अन्याय, संवेदनहीनता और व्यवस्था की खामियों पर सवाल उठाते हैं, पर उनकी भाषा कभी आक्रामक नहीं होती। उनके यहाँ प्रतिरोध भी मानवीय स्वर में आता है—ऐसा स्वर जो चेताता है, झकझोरता है, लेकिन मनुष्य पर भरोसा बनाए रखता है। यही संतुलन उनकी कविताओं को स्थायित्व देता है।
भाषा के स्तर पर ‘मिज़ाज़’ की कविता बोलचाल की हिंदी को नई गरिमा देती है। वे यह साबित करते हैं कि साधारण शब्दों में भी गहरी और प्रभावशाली बात कही जा सकती है। उनकी पंक्तियाँ इसलिए याद रह जाती हैं क्योंकि वे बनावटी नहीं लगतीं—वे जीवन से उपजी होती हैं। यह भाषा कवि और पाठक के बीच दूरी नहीं बनाती, बल्कि संवाद का एक सहज पुल तैयार करती है।
आज के दौर में, जब कविता या तो अत्यधिक आत्मकेंद्रित हो जाती है या फिर वैचारिक शोर में बदल जाती है, अशोक ‘मिज़ाज़’ एक अलग और ज़रूरी रास्ता चुनते हैं। वे व्यक्ति और समाज के रिश्ते को केंद्र में रखते हैं। उनकी कविता में समय की बेचैनी भी है और मनुष्य के प्रति भरोसा भी—एक ऐसा भरोसा जो उम्मीद जगाता है, बिना किसी दिखावटी आशावाद के।
जन्मदिवस के इस अवसर पर अशोक ‘मिज़ाज़’ के रचनात्मक अवदान को स्मरण करते हुए कहा जा सकता है कि उनकी कविता हमारे समय की ज़रूरत है। वह हमें संवेदनशील बनाती है, सवाल करना सिखाती है और यह एहसास कराती है कि सच्चे शब्द अक्सर बिना शोर किए ही सबसे गहरी जगह तक पहुँच जाते हैं। यही उनकी कविता की शक्ति है और यही उनका साहित्यिक महत्व।
जन्मदिवस के इस अवसर पर अशोक ‘मिज़ाज़’ के रचनात्मक अवदान को स्मरण करते हुए कहा जा सकता है कि उनकी कविता हमारे समय की एक ज़रूरी नैतिक आवाज़ है। वह न तो शोर मचाती है और न ही आसान निष्कर्ष देती है, बल्कि पाठक को सच के साथ ठहरकर देखने का साहस देती है। संवेदना, विवेक और ईमानदारी से रची उनकी पंक्तियाँ समय के दबाव में भी अपना अर्थ नहीं खोतीं। यही कारण है कि अशोक ‘मिज़ाज़’ की कविता केवल अपने समय की दस्तावेज़ नहीं, बल्कि आने वाले समय के लिए भी एक ज़िम्मेदार विरासत बनकर खड़ी रहती है।




