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चीन के लिए निकला रूसी तेल जहाज बीच रास्ते से मुड़ा, भारत पहुंचा, संकट में दिखी रूस-भारत दोस्ती

चीन के लिए निकला रूसी तेल जहाज बीच रास्ते से मुड़ा, भारत पहुंचा, संकट में दिखी रूस-भारत दोस्ती

द फ्रंट डेस्क: मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए तेजी से रणनीतिक फैसले लेने शुरू कर दिए हैं। ऐसे मुश्किल समय में रूस एक बार फिर भारत के भरोसेमंद साझेदार के रूप में सामने आया है।
चीन के लिए रवाना हुए रूसी तेल टैंकरों का बीच समुद्र में अपना रूट बदलकर भारत की ओर मुड़ना सिर्फ एक व्यापारिक फैसला नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और कूटनीति का बड़ा संकेत है।
करीब 7.7 लाख टन कच्चा तेल लेकर रूसी जहाज ‘एक्वा टाइटन’ अब भारत के मंगलुरु पोर्ट पहुंच चुका है, जिससे भारत की ऊर्जा जरूरतों को बड़ी राहत मिली है।

चीन छोड़ भारत आया रूसी जहाज

रूस से कच्चा तेल लेकर कुल 7 जहाज चीन के लिए रवाना हुए थे। इन जहाजों का गंतव्य चीन का रिझाओ बंदरगाह था, लेकिन हालात बदलते ही इन जहाजों ने समुद्र के बीच में ही अपना रास्ता बदल लिया। 18 मार्च को इन टैंकरों ने अचानक दिशा बदलते हुए भारत की ओर रुख किया। अब इनमें से एक जहाज ‘एक्वा टाइटन’ भारत पहुंच चुका है, जबकि बाकी 6 जहाज भी भारतीय समुद्री सीमा की ओर बढ़ रहे हैं और आने वाले दिनों में एक-एक कर पहुंचेंगे। मंगलुरु पोर्ट पर इस कच्चे तेल को पाइपलाइन के जरिए रिफाइनरी तक पहुंचाया जाएगा, जहां MRPL (मंगलुरु रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड) में इसे प्रोसेस किया जाएगा। इससे पेट्रोल, डीजल और अन्य ईंधन उत्पादों की आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने में मदद मिलेगी।

होर्मुज संकट के बीच भारत की रणनीति

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जो दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है, वहां बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल सप्लाई को प्रभावित करना शुरू कर दिया था। इस मार्ग के बाधित होने की आशंका ने भारत जैसे बड़े आयातक देशों की चिंता बढ़ा दी थी। भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, ऐसे में सप्लाई बाधित होने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों पर पड़ सकता था।
इसी खतरे को देखते हुए भारत ने समय रहते अपनी रणनीति बदली और रूस से तेल खरीद बढ़ाने का फैसला किया। भारतीय तेल कंपनियों ने करीब 30 मिलियन बैरल कच्चे तेल का बड़ा ऑर्डर दिया, ताकि आपूर्ति की निरंतरता बनी रहे और बाजार में कीमतों को नियंत्रित रखा जा सके।

क्यों बदला जहाजों का रास्ता?

रूसी जहाजों का चीन की बजाय भारत की ओर मुड़ना सामान्य व्यापारिक गतिविधि से कहीं ज्यादा बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है। इसके पीछे कई रणनीतिक और कूटनीतिक कारण हैं। पहला, भारत और रूस के बीच लंबे समय से मजबूत ऊर्जा और रक्षा संबंध रहे हैं। संकट के समय रूस द्वारा भारत को प्राथमिकता देना इसी भरोसे का परिणाम है। दूसरा, अमेरिका द्वारा रूसी तेल पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों में अस्थायी ढील दी गई, जिससे भारत के लिए रूसी तेल खरीदना आसान हो गया। तीसरा, भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका और उसकी कूटनीतिक ताकत भी इस फैसले में अहम रही। इन सभी कारणों के चलते रूस ने अपने जहाजों का रुख चीन से बदलकर भारत की ओर कर दिया, जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा संकेत माना जा रहा है।

अमेरिका से भी आई गैस की खेप

भारत ने केवल रूस पर ही निर्भर नहीं रहकर अपनी ऊर्जा आपूर्ति को विविध बनाने की भी रणनीति अपनाई है। इसी के तहत अमेरिका से भी LPG की बड़ी खेप भारत पहुंची है। टेक्सास से गैस लेकर ‘Pyxis Pioneer’ जहाज मंगलुरु पोर्ट पहुंच चुका है। इसके अलावा 25 मार्च तक दो और जहाज भारत पहुंचने वाले हैं—एक करीब 26,687 मीट्रिक टन और दूसरा लगभग 30 हजार मीट्रिक टन LPG लेकर। यह दिखाता है कि भारत एक साथ कई स्रोतों से ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित कर रहा है, ताकि किसी एक क्षेत्र में संकट होने पर देश की ऊर्जा जरूरतें प्रभावित न हों।

ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीति का बड़ा संदेश

इस पूरे घटनाक्रम को केवल तेल सप्लाई तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक सोच और कूटनीतिक मजबूती का स्पष्ट संकेत है। मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के बीच जहां कई देश ऊर्जा संकट से जूझ रहे हैं, वहीं भारत ने समय रहते अपने विकल्प तैयार कर लिए हैं। रूस से तेल और अमेरिका से गैस की आपूर्ति सुनिश्चित कर भारत ने यह दिखाया है कि वह वैश्विक संकट के बीच भी अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम है।

चीन के लिए निकले रूसी जहाजों का भारत की ओर मुड़ना केवल एक सप्लाई शिफ्ट नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में हो रहे बदलाव का संकेत है। मिडिल ईस्ट संकट के बीच भारत ने जिस तरह से अपनी ऊर्जा रणनीति को मजबूत किया है, वह आने वाले समय में उसकी आर्थिक स्थिरता और वैश्विक स्थिति को और मजबूत कर सकता

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