पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK में चल रहे आंदोलन के बीच एक बार फिर LoC यानी नियंत्रण रेखा को खत्म करने और भारत के जम्मू-कश्मीर से पुराने रास्ते खोलने की मांग सामने आई है। 26 सितंबर को मंढोल में आयोजित एक धरने में अवामी एक्शन कमेटी से जुड़े नेता सरदार अमान खान ने LoC खत्म करने, पुंछ-मेंढर के रास्ते खोलने और पाकिस्तान से आजादी की मांग उठाई। रिपोर्ट के मुताबिक, धरने में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। मंच से अमान खान ने लोगों से LoC को खत्म करने और भारत के पुंछ-मेंढर के रास्ते खोलने को लेकर सवाल किए, जिस पर मौजूद लोगों ने समर्थन जताया। उन्होंने पाकिस्तान की सेना और PoK की स्थानीय व्यवस्था पर भी कई गंभीर आरोप लगाए। लेकिन आखिर PoK में ऐसा क्या हुआ कि LoC खत्म करने और भारत के साथ पुराने संपर्क बहाल करने की आवाज तेज हो गई? पाकिस्तान से PoK के लोगों की नाराजगी की वजह क्या बताई जा रही है? राशन, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं से लेकर राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक विवाद किन मुद्दों पर है? समझिए पूरा मामला।
PoK में अचानक LoC और भारत की बात क्यों उठी?
मंढोल में हुए धरने में LoC को खत्म करने की मांग आंदोलन के प्रमुख मुद्दों में दिखाई दी। अवामी एक्शन कमेटी से जुड़े नेता सरदार अमान खान, जो PoK में चल रहे विरोध आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं, ने लोगों से पूछा कि क्या LoC खत्म होनी चाहिए और क्या इसके लिए LoC के नजदीक आंदोलन किया जाना चाहिए। उन्होंने पुंछ और मेंढर के पुराने रास्तों को खोलने की मांग भी उठाई। इस मांग के पीछे स्थानीय लोगों की आवाजाही और व्यापार से जुड़े पुराने संबंधों का तर्क दिया गया। अमान खान का दावा है कि पहले PoK के कुछ इलाकों के लोग जम्मू-कश्मीर के पुंछ और मेंढर के रास्ते सामान और राशन लाते थे। उनका आरोप है कि LoC पर फेंसिंग और आवाजाही पर पाबंदियों के बाद यह संपर्क टूट गया। यही वजह है कि मौजूदा आंदोलन में LoC को सिर्फ सीमा के तौर पर नहीं, बल्कि लोगों के पुराने सामाजिक और आर्थिक संपर्क के रास्ते के रूप में भी पेश किया जा रहा है। हालांकि, LoC को हटाने या बदलने का सवाल एक संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय और सुरक्षा मुद्दा है।
राशन से रोजगार तक, PoK में आंदोलन की असली वजह क्या बताई जा रही है?
PoK में जारी आंदोलन को लेकर स्थानीय स्तर पर कई तरह की मांगें सामने आई हैं। अमान खान ने राशन की आपूर्ति, अस्पताल, स्कूल, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों का जिक्र किया। उनका आरोप है कि पाकिस्तान सरकार ने PoK के लोगों की बुनियादी जरूरतों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। अमान खान ने यह भी दावा किया कि पिछले तीन महीनों से PoK में राशन की सप्लाई प्रभावित है और लोगों को जरूरी सामान के लिए मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। उनके मुताबिक, पहले स्थानीय लोग सीमा पार जम्मू-कश्मीर के पुंछ और मेंढर के बाजारों से सामान लाते थे। हालांकि, राशन आपूर्ति और आंदोलन से जुड़े इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। आंदोलन के नेताओं का कहना है कि आर्थिक और बुनियादी सुविधाओं की समस्याएं ही लोगों के असंतोष को बढ़ा रही हैं।
पाकिस्तान की सेना पर क्या आरोप लगाए जा रहे हैं?
आंदोलन के दौरान पाकिस्तान की सेना की भूमिका को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए। अमान खान ने आरोप लगाया कि PoK में बुनियादी सुविधाओं और रोजगार की मांग करने वाले लोगों के खिलाफ बल प्रयोग किया गया और बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई। उन्होंने पाकिस्तान की सेना पर लंबे समय से PoK के संसाधनों और जमीन पर नियंत्रण रखने का आरोप भी लगाया। अमान खान ने कहा कि PoK के लोगों को अपने अधिकारों और संसाधनों पर ज्यादा नियंत्रण मिलना चाहिए। इन आरोपों को आंदोलनकारी नेताओं के दावों के रूप में देखना जरूरी है। किसी भी हिंसा, मौत या सैन्य कार्रवाई से जुड़े आंकड़ों की पुष्टि के लिए स्वतंत्र और विश्वसनीय स्रोतों की जरूरत होती है। यही इस पूरे विवाद को समझने का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
PoK की सरकार और चुनाव को लेकर इतना विवाद क्यों?
आंदोलनकारियों ने PoK की स्थानीय सरकार और राजनीतिक व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं। अमान खान का आरोप है कि मुजफ्फराबाद में मौजूद सरकार पाकिस्तान की सेना के दबाव में काम करती है और स्थानीय लोगों के हितों की पर्याप्त पैरवी नहीं करती। उन्होंने PoK में हालिया चुनावी प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए। उनके मुताबिक, आंदोलन के कारण कुछ सीटों पर चुनाव नहीं हो सका, जबकि बाकी सीटों पर चुनाव कराया गया और पाकिस्तान की सत्तारूढ़ पार्टी को फायदा पहुंचा। यहां भी चुनाव से जुड़े आरोपों और वास्तविक चुनावी प्रक्रिया के बीच अंतर समझना जरूरी है। अमान खान और आंदोलनकारी समूह इसे राजनीतिक हस्तक्षेप के तौर पर देखते हैं, जबकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग स्रोतों से की जानी चाहिए।
क्या PoK में भारत के साथ विलय की मांग वास्तव में बढ़ रही है?
मंढोल के धरने में भारत के जम्मू-कश्मीर के पुंछ और मेंढर के रास्ते खोलने तथा LoC खत्म करने की मांग जरूर उठी। आंदोलन में शामिल लोगों ने इन मांगों का समर्थन भी किया। लेकिन इसे सीधे तौर पर PoK की पूरी आबादी की राय या भारत में तत्काल विलय की औपचारिक प्रक्रिया के रूप में देखना सही नहीं होगा। अमान खान ने पाकिस्तान से आजादी की मांग भी उठाई और कहा कि PoK के लोगों की समस्याओं का समाधान पाकिस्तान के नियंत्रण से बाहर निकलने में है। उनका दावा है कि क्षेत्र की कई पीढ़ियां पाकिस्तान के नियंत्रण में रह रही हैं। इस तरह मौजूदा विवाद में तीन अलग-अलग मुद्दे एक साथ दिखाई देते हैं। स्थानीय आर्थिक और राजनीतिक शिकायतें, पाकिस्तान की सेना और प्रशासन के खिलाफ विरोध और LoC के पार जम्मू-कश्मीर के साथ पुराने संपर्क बहाल करने की मांग। भारत के साथ भविष्य के राजनीतिक संबंध का सवाल इससे जुड़ा हुआ है, लेकिन मौजूदा धरने के नारों को किसी औपचारिक राजनीतिक प्रक्रिया के बराबर नहीं माना जा सकता।
अब आगे क्या?
PoK में जारी आंदोलन का सबसे बड़ा सवाल यही है कि स्थानीय असंतोष आगे किस दिशा में जाता है। अगर राशन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर समाधान नहीं निकलता है तो आंदोलनकारी समूह पाकिस्तान की सरकार और सेना पर दबाव बढ़ा सकते हैं। वहीं LoC खत्म करने और पुंछ-मेंढर के रास्ते खोलने जैसी मांगें इसे केवल स्थानीय प्रशासन का मुद्दा नहीं रहने देतीं। इसका संबंध भारत-पाकिस्तान के बीच संवेदनशील सीमा व्यवस्था से भी जुड़ जाता है।
फिलहाल मंढोल की घटना को PoK में चल रहे व्यापक असंतोष के एक हिस्से के तौर पर देखा जा सकता है। आंदोलनकारी पाकिस्तान के नियंत्रण, स्थानीय शासन, आर्थिक मुश्किलों और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठा रहे हैं। दूसरी तरफ LoC और भारत के साथ संपर्क की मांग इस आंदोलन को एक अलग रणनीतिक और राजनीतिक आयाम दे रही है। आगे इस आंदोलन की दिशा और पाकिस्तान सरकार की प्रतिक्रिया से तय होगा कि यह असंतोष कितनी दूर तक जाता है।




