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नैनीताल, 21 जुलाई 2021

पर्यावरण संरक्षण के मामले में दायर की गई एक याचिका को उत्तराखंड हाई कोर्ट ने खारिज करते हुए गंभीर टिप्पणी भी की. कोर्ट ने कहा कि याचिका दायर करने की न्याय व्यवस्था या उपकरण का इस्तेमाल किया जा रहा है. ‘कुछ व्यक्तियों या संस्थाओं के इशारे पर याचिकाएं दायर करवाई जा रही हैं.’ जिस याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह टिप्पणी की, उसमें वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को यह आदेश देने की मांग की गई थी कि ऋषिगंगा वैली और तपोवन विष्णुगढ़ में हाइड्रो प्रोजेक्ट संबंधी मंज़ूरियों को निरस्त किया जाए ताकि पर्यावरण को बचाया जा सके.

चीफ जस्टिस राघवेंद्र सिंह चौहान और जस्टिस आलोक कुमार वर्मा की बेंच ने इस मामले में सुनवाई करते हुए तल्ख टिप्पणी की, ‘याचिकाकर्ता अनजानी उंगलियों की कठपु​तलियां बनकर रह गए हैं.’ वास्तव में, इस याचिका के संबंध में हाई कोर्ट ने यह जानना चाहा था कि इस याचिका के पीछे किसका क्या मकसद था! कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के रिकॉर्ड के बारे में पूछा और समाजसेवा या किसी आंदोलन से उनका कोई जुड़ाव ठीक तरह से कोर्ट के सामने न आने के बाद कोर्ट ने यह बात कही.

याचिका की मांगें और कोर्ट का रुख
याचिकाकर्ताओं के प्रतिनिधि के तौर पर हाई कोर्ट में एडवोकेट डीके जोशी ने पैरवी की थी. इस याचिका में कोर्ट से कुछ इस तरह की प्रमुख मांगें की गई थीं

1. पूरे ऋषिगंगा और धौलीगंगा क्षेत्र में प्रदेश सरकार को पहाड़ों में धमाके, नदी किनारों पर खनन और पत्थर क्रश करने से रोका जाए.
2. पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के आरोप में एनटीपीसी और ऋषिगंगा हाइड्रो पावर लिमिटेड पर ब्लैकलिस्ट किए जाने जैसी सख्त कार्रवाई की जाए.
3. रैणी गांव के सुरक्षित विस्थापन के साथ ही प्रभावित हुए लोगों को मुआवज़ा दिलवाया जाए.

इस तरह की मांगें करने वाली याचिका के पीछे कौन लोग हैं? कोर्ट ने यह सवाल पूछा. कोर्ट ने कहा, ‘उन्होंने यह उल्लेख नहीं किया कि वो किस सामाजिक आंदोलन से जुड़े हैं या पहले किस तरह के सामाजिक काम कर चुके हैं, न ही यह बताया कि वो किसी एनजीओ या सामाजिक एक्टिविस्ट संस्था से जुड़े हैं.’ लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक इसके बाद कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए 10 हज़ार रुपये का जुर्माना भी याचिकाकर्ताओं पर लगाया, जो उन्हें हाई कोर्ट एडवोकेट वेलफेयर फंड में जमा करवाना होगा.