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नई दिल्ली, 21 अप्रैल 2021

भले ही कोविड प्रोटोकॉल ने अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू परिवहन को प्रतिबंधित किया है, लेकिन सीमा पार से अपराध सिंडिकेट्स भूमि और समुद्री मार्गों के माध्यम से भारत में अवैध तरीके से सामान की तस्करी करके मोटी कमाई कर रहे हैं।

तमू (म्यांमार) और दुबई दो प्रमुख तस्करी के हब के तौर पर उभरे हैं, जहां शीर्ष तस्करी सिंडिकेट्स के अड्डों से ब्रांडेड सिगरेट की बड़ी खेप धकेली जा रही है, जिसे सोने की तुलना में अधिक लाभकारी मार्जिन के तौर पर सबसे आकर्षक वस्तु माना जा रहा है।

मलेशिया और इंडोनेशिया में अवैध कारखानों का पता लगाने के अलावा भारतीय एजेंसियों ने हाल ही में एक म्यांमार आधारित अपराध सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया है, जो विदेशी ब्रांड सिगरेट की बड़ी खेप को भारत में धकेल रहा है। इनमें मुख्य रूप से मार्लबोरो, 555 और एसेस लाइट्स जैसे ब्रांड्स शामिल हैं।

सीमा शुल्क आयुक्त (निवारक) वी. पी. शुक्ला ने आईएएनएस से पुष्टि करते हुए कहा कि उनकी टीम ने उत्तर प्रदेश में पिछले दो महीनों में नागालैंड नंबर प्लेटों वाले ब्रांडेड सिगरेट से लदे दो ट्रक जब्त किए हैं। 1993 बैच के आईआरएस अधिकारी शुक्ला ने कहा, “यह एक बहुत ही संवेदनशील जांच है और मैं इस मुद्दे पर अधिक टिप्पणी नहीं करूंगा।”

एक पूर्व शीर्ष अधिकारी ने इस पर विस्तार से बात की है कि सिगरेट आखिर तस्करी के लिए सबसे आकर्षक वस्तु के तौर पर कैसे उभरी है और यह ड्रग्स और पीली धातु (गोल्ड) से भी अधिक लाभदायक कैसे हो गई है।

राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) के पूर्व प्रमुख डी. पी. डैश ने खुलासा करते हुए कहा कि सिगरेट पर कम उत्पादन लागत और करों की बहुत अधिक दर के कारण, इस मद की तस्करी में लाभ सबसे अधिक है। ड्रग्स और नकली मुद्रा की तुलना में इसमें जोखिम भी कम है। यही वजह है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तस्करी करने वालों के बीच इन दिनों यह एक पसंदीदा काम बन चुका है।

अमेरिकी विदेश विभाग के अनुमानों के अनुसार, सिगरेट के अवैध व्यापार से दुनिया भर में सालाना 50 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक का कर (टैक्स) नुकसान हो रहा है। इस दिशा में भारत को भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ता है, क्योंकि उपमहाद्वीप में सक्रिय क्राइम सिंडिकेट अब मुख्य रूप से इस गोरखधंधे पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

महामारी के समय तस्करी के जरिए मोटी रकम कमाने के लिए अब सोना तस्करी नहीं, बल्कि सिगरेट की तस्करी ऐसा अवैध धंधा बन चुकी है, जिसके जरिए तस्कर खूब कमाई कर रहे हैं।

पिछले महीने की शुरूआत में नवी मुंबई में नेहरू पोर्ट ट्रस्ट में छापे के दौरान एक सबसे बड़ी सिगरेट तस्करी के अड्डे का भंडाफोड़ करने वाली एक टीम से जुड़े कस्टम अधिकारी ने कहा, “जैसे ही क्रय शक्ति (पर्चेजिंग पावर) थोड़ी तंग हो जाती है तो लोग आभूषण या सोने में निवेश करने से कतराते हैं, लेकिन धूम्रपान के आदी लोग इसे आसानी से नहीं छोड़ेंगे। इसके अलावा लॉकडाउन या कर्फ्यू के दौरान पान की दुकानों या किराने की दुकानों की तरह सिगरेट बेचने वाली खुदरा वितरण श्रृंखलाएं चालू रहती हैं। इसलिए यह अवैध व्यापार आगे बढ़ता है।”

अधिकारी के अनुसार, सिंडिकेट सक्रिय हो सकते हैं, लेकिन देश में अवैध सामान और नशीले पदार्थों को धकेलने में शामिल गिरोह का पदार्फाश करने में डीआरआई अधिकारी पीछे नहीं हैं और वह इस प्रकार के गिरोह को नष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

सीमा शुल्क के शीर्ष सूत्रों ने कहा कि दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरू अवैध तरीके से लाई गई सिगरेट वितरण के प्रमुख केंद्र हैं। मंगलवार (20 अप्रैल) को जब एक नकली नागालैंड नंबर प्लेट लगी विदेशी सिगरेट से लदा एक ट्रक लखनऊ से गुजर रहा था, तो कस्टम अधिकारियों ने इसे पकड़ लिया। इसमें लदी सिगरेट की कीमत 2 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है।

सूत्रों ने बताया कि तीन तस्करों को मौके पर गिरफ्तार किया गया। तस्करों के पास से बरामद किए गए हजारों सिगरेट पैक में एक बारकोड था, जिससे पता चला कि स्विट्जरलैंड में ड्यूटी फ्री दुकानों से मार्लबोरो ब्रांड के सिगरेट की बड़ी खेप को धकेला गया है। यह देखकर आश्चर्य हुआ कि यूरोप से इतनी दूर यह खेप म्यांमार कैसे पहुंची और बाद में मणिपुर में मोरेह सीमा के रास्ते भारत में धकेल दी गई। खेप के दिल्ली पहुंचने की उम्मीद थी, जहां सिगरेट के पैकेट्स को दिल्ली-एनसीआर के बाजार में बेचा जाता।

एक सूत्र ने आईएएनएस को बताया कि ट्रकों की नकली पंजीकरण प्लेटों और अन्य तरीकों से हर स्तर पर तस्कर अपनी पहचान छिपाने की कोशिश करते हैं। इसके अलावा वह फर्जी फास्ट टैग, जाली आधार कार्ड से लेकर जाली सिम कार्ड भी उपयोग करते हैं। उनके सभी दस्तावेज आमतौर पर नकली होते हैं। सूत्र ने कहा कि वास्तव में अधिकतर गिरोह के सदस्यों को भी वास्तविक खेप का पता नहीं होता है।