राष्ट्रपति पुतिन और पीएम मोदी की मुलाकात ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि रूस भारत के लिए महज ऊर्जा या रक्षा का साझेदार नहीं, बल्कि दशकों पुराना रणनीतिक सहयोगी है। रूसी तेल को लेकर उठते सवालों के बीच यह समझना जरूरी है कि भारत अपने फैसले किसी दूसरे देश को खुश करने के लिए नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर करता है।
बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत को रूस के साथ अपने संबंधों को और संस्थागत एवं दीर्घकालिक बनाना चाहिए। रक्षा, ऊर्जा, परमाणु तकनीक, अंतरिक्ष और उभरती तकनीकों में सहयोग को नई परिस्थितियों के अनुरूप विस्तार देना भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करेगा।
इसी तर्क को चीन पर भी लागू करने की जरूरत है। सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा अपनी जगह हैं, लेकिन चीन भारत का निकटवर्ती पड़ोसी और एक बड़ी आर्थिक शक्ति है; इसलिए टकराव को स्थायी विदेश नीति बना देना उतना ही अव्यावहारिक होगा जितना सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज करना।
पश्चिम के साथ भारत की साझेदारी भी महत्वपूर्ण है, लेकिन हाल के वर्षों में बदलती नीतियों, व्यापारिक दबावों और प्रतिबंधों ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि क्या आज के रणनीतिक समीकरण भविष्य में भी उतने ही स्थिर रहेंगे। ऐसे वातावरण में किसी एक शक्ति-केंद्र पर अत्यधिक निर्भरता भारत के दीर्घकालिक हित में नहीं हो सकती।
भारत की विदेश नीति का लक्ष्य किसी खेमे में शामिल होना नहीं, बल्कि स्वयं एक प्रभावशाली ध्रुव बनना होना चाहिए। रूस और चीन के साथ मजबूत लेकिन हित-आधारित संबंध तथा पश्चिम के साथ व्यावहारिक साझेदारी, यही वह संतुलन है जो भारत को बदलती विश्व व्यवस्था में अपनी शर्तों पर आगे बढ़ने की क्षमता देगा।
बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत को रूस के साथ अपने संबंधों को और संस्थागत एवं दीर्घकालिक बनाना चाहिए। रक्षा, ऊर्जा, परमाणु तकनीक, अंतरिक्ष और उभरती तकनीकों में सहयोग को नई परिस्थितियों के अनुरूप विस्तार देना भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करेगा।
इसी तर्क को चीन पर भी लागू करने की जरूरत है। सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा अपनी जगह हैं, लेकिन चीन भारत का निकटवर्ती पड़ोसी और एक बड़ी आर्थिक शक्ति है; इसलिए टकराव को स्थायी विदेश नीति बना देना उतना ही अव्यावहारिक होगा जितना सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज करना।
पश्चिम के साथ भारत की साझेदारी भी महत्वपूर्ण है, लेकिन हाल के वर्षों में बदलती नीतियों, व्यापारिक दबावों और प्रतिबंधों ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि क्या आज के रणनीतिक समीकरण भविष्य में भी उतने ही स्थिर रहेंगे। ऐसे वातावरण में किसी एक शक्ति-केंद्र पर अत्यधिक निर्भरता भारत के दीर्घकालिक हित में नहीं हो सकती।
भारत की विदेश नीति का लक्ष्य किसी खेमे में शामिल होना नहीं, बल्कि स्वयं एक प्रभावशाली ध्रुव बनना होना चाहिए। रूस और चीन के साथ मजबूत लेकिन हित-आधारित संबंध तथा पश्चिम के साथ व्यावहारिक साझेदारी, यही वह संतुलन है जो भारत को बदलती विश्व व्यवस्था में अपनी शर्तों पर आगे बढ़ने की क्षमता देगा।




