सोना बेचने पर मजबूर रूस… युद्ध, बजट और रणनीति का दबाव

सोना बेचने पर मजबूर रूस… युद्ध, बजट और रणनीति का दबाव

द फ्रंट डेस्क: रूस ने 25 साल में पहली बार अपने सोने के भंडार को बेचना शुरू किया है, और यह सिर्फ एक आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि दबाव में लिया गया रणनीतिक संकेत है. जनवरी और फरवरी में करीब 35 अरब डॉलर के बराबर सोना बेचकर रूस ने अपने रिज़र्व को 74.3 मिलियन ट्रॉय औंस तक ला दिया है, जो पिछले चार साल का सबसे निचला स्तर है. यह वही रूस है जिसने 2022 में Russia-Ukraine War शुरू होने के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों से बचने के लिए सोने को ढाल की तरह जमा करना शुरू किया था. अब उसी ढाल को बेचने की नौबत आना बताता है कि दबाव सतही नहीं, संरचनात्मक है.

मुद्दा सिर्फ इतना नहीं है कि सोना बेचा गया, बल्कि यह है कि क्यों बेचा गया. आज रूस का करीब 40% संघीय बजट रक्षा खर्च में जा रहा है. युद्ध लंबा खिंच चुका है और इसकी कीमत अब सीधे अर्थव्यवस्था पर दिखने लगी है. अनुमान है कि रूस को लगभग 1.8% जीडीपी का घाटा झेलना पड़ेगा. ऐसे में सोना, जो अब तक सुरक्षा कवच था, उसे नकदी में बदलना मजबूरी बन गया है. यह उस रणनीति से बिल्कुल उलट है जिसमें रूस डॉलर आधारित सिस्टम से बाहर निकलकर सोना और वैकल्पिक संपत्तियों पर निर्भरता बढ़ा रहा था.

Vladimir Putin ने इस स्थिति को संभालने के लिए एक और दिलचस्प कदम उठाया है. उन्होंने 100 ग्राम से बड़े refined gold bars के निर्यात पर 1 मई से रोक लगाने का फैसला किया है. इसका सीधा मतलब है कि रूस अब अपने सोने को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचने के बजाय घरेलू स्तर पर ही होल्ड और मैनेज करना चाहता है, खासकर ऐसे समय में जब कीमतें 4400 डॉलर प्रति औंस के आसपास ऊंचाई पर हैं. यह कदम एक तरह से “damage control” है, ताकि रिज़र्व तेजी से बाहर न जाए और घरेलू वित्तीय सिस्टम को सहारा मिलता रहे.

लेकिन असली दबाव सिर्फ युद्ध से नहीं आ रहा. रूस ने पश्चिम से दूरी बनाकर चीन के साथ व्यापार बढ़ाया, लेकिन अब वहां भी एक नई समस्या खड़ी हो गई है — युआन लिक्विडिटी का संकट. चीन के साथ बढ़ते लेनदेन के बावजूद पर्याप्त तरलता नहीं मिल रही, जिससे रूस की कैश फ्लो स्थिति और तंग हो रही है. यानी एक तरफ डॉलर सिस्टम से बाहर निकलने की कोशिश, दूसरी तरफ वैकल्पिक सिस्टम भी पूरी तरह सहारा नहीं दे पा रहा.

यह पूरा घटनाक्रम एक बड़ी तस्वीर की ओर इशारा करता है. रूस ने पिछले कुछ सालों में जिस आर्थिक सुरक्षा मॉडल को बनाया था — सोना जमा करना, डॉलर पर निर्भरता कम करना, और चीन की ओर झुकाव — वह अब दबाव में है. युद्ध ने उस मॉडल की सीमाएं उजागर कर दी हैं. जब रक्षा खर्च इतना बड़ा हो जाए कि बजट का संतुलन बिगड़ने लगे, तो सबसे मजबूत रिज़र्व भी धीरे-धीरे खपत में बदलने लगते हैं.

इसका मतलब यह नहीं कि रूस तत्काल आर्थिक संकट में है, लेकिन यह जरूर साफ हो गया है कि युद्ध की कीमत अब उसकी वित्तीय संरचना पर असर डाल रही है. सोना बेचना एक अस्थायी समाधान हो सकता है, लेकिन अगर यही ट्रेंड जारी रहता है, तो यह रूस की दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति पर भी सवाल खड़े करेगा. यह कहानी सिर्फ एक देश की नहीं, बल्कि यह बताती है कि भू-राजनीतिक फैसलों की असली लागत आखिरकार अर्थव्यवस्था को ही चुकानी पड़ती है.

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