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‘5 दिन का तेल’ या 70 दिन की सच्चाई? BBC की रिपोर्ट पर वरिष्ठ पत्रकार राणा यशवंत का तथ्यात्मक प्रहार

‘5 दिन का तेल’ या 70 दिन की सच्चाई? BBC की रिपोर्ट पर वरिष्ठ पत्रकार राणा यशवंत का तथ्यात्मक प्रहार

द फ्रंट डेस्क: हाल ही में BBC की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारत के रणनीतिक तेल भंडार केवल पांच दिन की जरूरत पूरी कर सकते हैं. रिपोर्ट में कहा गया कि देश की कुल क्षमता का एक बड़ा हिस्सा खाली है और आयात पर भारी निर्भरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा को कमजोर बनाती है. साथ ही, कुछ शहरों में घबराहट में खरीदारी बढ़ने की बात भी सामने रखी गई. इस रिपोर्ट पर वरिष्ठ पत्रकार राणा यशवंत ने तीखी और तथ्य आधारित प्रतिक्रिया दी है. उनका कहना है कि यह रिपोर्ट ‘आधा सच दिखाकर पूरा भ्रम’ पैदा करती है और भारत की वास्तविक ऊर्जा सुरक्षा को गलत तरीके से प्रस्तुत करती है.

नीचे पढ़िए उनका पूरा विश्लेषण

बीबीसी की यह रिपोर्ट पहली नज़र में तथ्यात्मक लगती है, लेकिन दरअसल यह “आधा सच, पूरा भ्रम” का क्लासिक उदाहरण है. रिपोर्ट की शुरुआत ही इस लाइन से होती है कि भारत के रणनीतिक तेल भंडार सिर्फ़ पांच दिन की मांग पूरी कर सकते हैं. यह बात तकनीकी रूप से गलत नहीं है, लेकिन जिस तरह इसे प्रस्तुत किया गया है, वही असली समस्या है. क्योंकि यह आंकड़ा केवल Strategic Petroleum Reserve यानी आपातकालीन भंडार का है, न कि भारत की कुल ऊर्जा सुरक्षा का.

सच्चाई यह है कि किसी भी देश की ऊर्जा सुरक्षा सिर्फ उसके रणनीतिक भंडार से नहीं मापी जाती. भारत के मामले में तो बिल्कुल नहीं. खुद उसी रिपोर्ट में यह स्वीकार किया गया है कि तेल विपणन कंपनियों के पास 64.5 दिनों का स्टॉक है और रणनीतिक भंडार को मिलाकर कुल क्षमता लगभग 74 दिन की है. लेकिन इस सबसे महत्वपूर्ण तथ्य को साइड में रखकर “5 दिन” को हेडलाइन बना देना साफ दिखाता है कि उद्देश्य जानकारी देना नहीं, बल्कि डर का माहौल बनाना है.

सीएजी की रिपोर्ट का हवाला देकर यह कहा गया कि भंडारण का एक-तिहाई हिस्सा खाली है. लेकिन यह भी आधा सच है. रणनीतिक भंडार हमेशा 100% भरे नहीं रखे जाते, क्योंकि इन्हें सिर्फ स्टोरेज नहीं, बल्कि ट्रेडिंग और रोटेशन मॉडल के तहत भी मैनेज किया जाता है. भारत में विशाखापत्तनम, मंगलोर और पदुर जैसे स्टोरेज में कई बार अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को भी स्टोरेज दिया जाता है, जिससे देश को आर्थिक और लॉजिस्टिक दोनों लाभ मिलते हैं. यानी खाली दिखने वाला हिस्सा “कमज़ोरी” नहीं, बल्कि “मैनेजमेंट स्ट्रैटेजी” का हिस्सा है.

रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत अपनी जरूरतों का 88% से ज्यादा तेल आयात करता है और मध्य-पूर्व पर निर्भर है. यह तथ्य पुराना फ्रेम लेकर वर्तमान को देखने की कोशिश है. पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपने आयात स्रोतों को तेजी से diversify किया है. रूस आज भारत के सबसे बड़े सप्लायर्स में शामिल हो चुका है, अमेरिका और अन्य देशों से भी आयात बढ़ा है. 40 से अधिक देशों से तेल खरीदने वाला भारत अब किसी एक क्षेत्र पर निर्भर नहीं है. इसलिए यह कहना कि मध्य-पूर्व में रुकावट से भारत की सप्लाई सीधे खतरे में आ जाएगी, आज के परिप्रेक्ष्य में अधूरा विश्लेषण है.

सबसे अहम बात जो रिपोर्ट में नजरअंदाज की गई, वह है भारत की refining क्षमता. भारत केवल कच्चा तेल आयात करने वाला देश नहीं है, बल्कि दुनिया के बड़े refining hubs में से एक है. देश के पास इतनी क्षमता है कि वह अपने घरेलू उपयोग के अलावा पेट्रोल-डीजल का निर्यात भी करता है. अगर वास्तव में स्थिति इतनी गंभीर होती, तो सबसे पहले बाजार में कमी दिखाई देती. लेकिन न तो कहीं पेट्रोल पंप सूखे हैं, न रिफाइनरी की रफ्तार धीमी हुई है. घबराहट में खरीदारी की बात भी रिपोर्ट में कही गई है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि यह किसी वास्तविक कमी के कारण हुई या अफवाहों के चलते. भारत सरकार और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा में साफ कहा है कि देश में पेट्रोल और डीजल का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है और सप्लाई पूरी तरह सामान्य है. पेट्रोलियम राज्य मंत्री सुरेश गोपी का 64% भंडारण वाला बयान भी इसी बात की पुष्टि करता है कि सिस्टम काम कर रहा है, न कि फेल हो रहा है.

इसके उलट, असली कहानी यह है कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लगातार मजबूत कर रहा है. 6.5 मिलियन मीट्रिक टन के नए रणनीतिक भंडार पर काम चल रहा है, जिससे आने वाले वर्षों में यह क्षमता और बढ़ेगी. लक्ष्य साफ है — अंतरराष्ट्रीय मानकों के करीब पहुंचना और किसी भी वैश्विक संकट के लिए तैयार रहना और सबसे बड़ा तथ्य, जिसे इस तरह की रिपोर्टें अक्सर नजरअंदाज कर देती हैं — भारत सिर्फ अपनी जरूरतें नहीं देख रहा. नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों को भारत लगातार पेट्रोलियम सप्लाई और इंफ्रास्ट्रक्चर सपोर्ट देता है. पाइपलाइन प्रोजेक्ट्स और सप्लाई एग्रीमेंट्स के जरिए यह सहयोग जारी है. सवाल सीधा है, जो देश अपने पड़ोसियों को ईंधन दे रहा हो, क्या वह खुद सिर्फ पांच दिन के भंडार पर खड़ा होगा?

आखिर में बात साफ है. भारत के पास 5 दिन का नहीं, बल्कि 60 से 74 दिन तक का वास्तविक ऊर्जा बफर है. उसके पास diversified सप्लाई है, मजबूत refining क्षमता है और विस्तार की स्पष्ट योजना है. ऐसे में केवल एक हिस्से को उठाकर पूरे सिस्टम को कमजोर बताना न तो निष्पक्ष विश्लेषण है और न ही जिम्मेदार पत्रकारिता. भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर दहशत फैलाने की कोशिश बंद होनी चाहिए. यह देश आज संकटों को मैनेज करने की क्षमता रखता है, न कि उनसे घबराने की. डेटा को पूरा देखिए, संदर्भ में देखिए — तब तस्वीर साफ दिखेगी

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