नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ से पहले ही अभिनेता मनोज बाजपेयी की आगामी फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ देश के सबसे बड़े सांस्कृतिक-राजनीतिक विवादों में बदल चुकी है। एक फिल्म के शीर्षक ने अदालत, पुलिस, राष्ट्रीय आयोगों और सियासत—सबको आमने-सामने ला खड़ा किया है। सवाल यही है कि आखिर ‘घूसखोर पंडित’ पर इतना बवाल क्यों मचा और अब तक क्या-क्या हुआ?
विवाद की शुरुआत कैसे हुई
मामला तब गरमाया जब ओटीटी प्लेटफॉर्म Netflix पर रिलीज़ होने वाली इस फिल्म का टीज़र और पोस्टर सामने आया। सोशल मीडिया पर आरोप लगे कि फिल्म का शीर्षक ‘पंडित’ शब्द को भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी से जोड़ता है, जिससे ब्राह्मण समुदाय की सामूहिक छवि को नुकसान पहुंचता है। देखते-देखते यह विरोध ऑनलाइन ट्रेंड से निकलकर राजनीतिक और कानूनी मोर्चे तक पहुंच गया।
दिल्ली हाईकोर्ट से लेकर लखनऊ FIR तक
विवाद बढ़ने पर दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई, जिसमें कहा गया कि फिल्म का शीर्षक संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत मिलने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा का उल्लंघन करता है, क्योंकि यह कथित रूप से सामूहिक मानहानि और सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुंचाता है।
इसी बीच उत्तर प्रदेश के लखनऊ स्थित हजरतगंज थाने में फिल्म से जुड़े लोगों के खिलाफ सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने और धार्मिक-जातिगत भावनाएं आहत करने के आरोपों में FIR दर्ज कर ली गई। योगी आदित्यनाथ सरकार की इस तेज़ कार्रवाई ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी।

24 घंटे में एक्शन, लेकिन बाकी मुद्दों पर चुप्पी?
राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान इस बात पर गया कि जिस तेजी से इस फिल्म पर कार्रवाई हुई, उसी तुलना में हाल के महीनों में UGC के समानता नियमों को लेकर हुए विरोध और प्रयागराज में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़े विवादों पर सरकार की ओर से वैसी त्वरित प्रतिक्रिया नहीं दिखी। यही तुलना इस पूरे मामले को और राजनीतिक रंग दे रही है।
आयोग, संगठनों और नेताओं की एंट्री
विवाद के बीच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को नोटिस जारी किया। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि फिल्म नकारात्मक रूढ़ियों को बढ़ावा देती है और एक मान्यता प्राप्त सामाजिक समूह को बदनाम करती है।
आरएसएस के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार ने ऐसे शीर्षकों को “अनैतिक और असंवैधानिक” बताते हुए कड़ी निंदा की। वहीं, बाबरी मस्जिद के पूर्व पक्षकार इक़बाल अंसारी ने भी इसे बेहद आपत्तिजनक करार दिया।
मायावती और अखिलेश यादव का रुख
बसपा प्रमुख मायावती ने फिल्म को “जातिवादी” बताते हुए केंद्र सरकार से इस पर तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग की और लखनऊ पुलिस की FIR को सही कदम करार दिया।
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव का बयान भी सामने आया। अखिलेश यादव ने कहा कि ऐसा सिनेमा नाम बदलकर भी रिलीज़ नहीं होना चाहिए। जब निर्माताओं को आर्थिक हानि होगी, तभी ऐसी फ़िल्में बनना बंद होंगी। पैसे के लालच में भाजपा का एजेंडा चलाने वाले भी भाजपाइयों की तरह पैसे को छोड़कर किसी और के सगे नहीं होते:- घूसखोर पंडत मामले पर अखिलेश यादव

फिल्म मेकर्स का स्पष्टीकरण
विवाद बढ़ने के बाद निर्देशक नीरज पांडे ने इंस्टाग्राम पर नोट जारी कर कहा कि यह फिल्म एक काल्पनिक पुलिस ड्रामा है। उनके मुताबिक, ‘पंडित’ शब्द किसी जाति या समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करता, बल्कि एक किरदार का अनौपचारिक नाम है। उन्होंने यह भी बताया कि लोगों की भावनाओं को देखते हुए फिलहाल सभी प्रचार सामग्री हटा ली गई है।
मनोज बाजपेयी ने भी कहा कि उनका किरदार एक त्रुटिपूर्ण व्यक्ति की कहानी है, न कि किसी समुदाय पर टिप्पणी।

राजनीति, वोटबैंक और बड़ा सवाल
विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समुदाय एक अहम वोटबैंक है और हाल के वर्षों में भाजपा पर इस वर्ग की उपेक्षा के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में ‘घूसखोर पंडित’ पर त्वरित कार्रवाई को कई लोग जातिगत संतुलन साधने की रणनीति के तौर पर देख रहे हैं, खासकर तब जब राज्य में आगामी विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं।
अब आगे क्या?
फिलहाल FIR दर्ज है, जांच जारी है, प्रचार सामग्री हट चुकी है और सियासी बयानबाज़ी तेज़ है। सवाल यह है कि क्या फिल्म अपने मौजूदा नाम के साथ रिलीज़ हो पाएगी या इसमें बदलाव होगा। इतना तय है कि ‘घूसखोर पंडित’ अब सिर्फ एक फिल्म नहीं रही—यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जातिगत संवेदनशीलता और राजनीति के टकराव की पूरी कहानी बन चुकी है।




