उर्दू साहित्य की संवेदनशील और गंभीर परंपरा में सिकंदर अली वज्द का नाम एक ऐसे रचनाकार के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने शायरी को दिखावे और लोकप्रियता की दौड़ से अलग रखकर आत्मा की सच्ची अभिव्यक्ति बनाया। 22 जनवरी 1914 को जन्मे सिकंदर अली वज्द उस दौर के शायर थे, जब साहित्य को समाज और मनुष्य के अंतर्मन को समझने का माध्यम माना जाता था। उनका रचना-संसार शोर नहीं करता, बल्कि पाठक को ठहरकर सोचने का अवसर देता है।
उनकी शायरी की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सादगी है। वे भारी-भरकम शब्दों या अलंकरणों के सहारे प्रभाव पैदा करने में विश्वास नहीं रखते थे। उनकी भाषा सहज, स्वाभाविक और आम आदमी के अनुभवों से जुड़ी हुई थी। इसी सरलता के भीतर जीवन का गहरा दर्शन छिपा रहता है, जो पहली नज़र में शांत लगता है, लेकिन धीरे-धीरे मन में उतरकर लंबे समय तक असर छोड़ता है।
सिकंदर अली वज्द की रचनाओं में इंसान की तन्हाई, समय की बेरुख़ी, समाज की विडंबनाएँ और रिश्तों की नाज़ुकता बार-बार सामने आती है। वे जीवन को किसी आदर्श या कल्पनालोक में नहीं, बल्कि उसकी पूरी सच्चाई के साथ स्वीकार करते हैं। उनकी शायरी न तो निराशा फैलाती है और न ही झूठा आशावाद गढ़ती है, बल्कि इंसान को खुद से रू-ब-रू कराती है।
वे उन शायरों में से थे, जिन्होंने साहित्य को मंचों की तालियों और मुशायरों की चकाचौंध से दूर रखा। प्रसिद्धि की इच्छा या तत्काल सराहना उनके लेखन का उद्देश्य नहीं थी। उन्होंने शब्दों के साथ एक ईमानदार और शांत रिश्ता निभाया, यही कारण है कि उनकी शायरी आज भी गंभीर साहित्यिक पाठकों के बीच सम्मान के साथ पढ़ी जाती है।
आज के दौर में, जब साहित्य और शायरी अक्सर तात्कालिक लोकप्रियता के दबाव में लिखी जाती है, सिकंदर अली वज्द का लेखन हमें यह याद दिलाता है कि सच्चा साहित्य वही है जो समय की कसौटी पर खरा उतरे। उनके जन्मदिन पर उन्हें याद करना उस उर्दू अदबी परंपरा को सम्मान देना है, जिसमें सादगी, गहराई और इंसानियत को सबसे ऊँचा स्थान दिया गया, और यही वजह है कि सिकंदर अली वज्द आज भी साहित्य प्रेमियों के दिलों में जीवित हैं।




