नए साल पर रिलीज हुई धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म, जानिए कैसी है फिल्म

नए साल पर रिलीज हुई धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म, जानिए कैसी है फिल्म

नए साल 2026 के पहले दिन सिनेमाघरों में रिलीज हुई फिल्म इक्कीस सिर्फ एक वॉर ड्रामा नहीं है, बल्कि यह जंग के पीछे छिपे दर्द, इंसानियत और एक पिता के अधूरे सपने की कहानी भी कहती है। यह फिल्म इसलिए भी खास है क्योंकि इसे दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र की आखिरी रिलीज़ बताई जा रही है। फिल्म में उनके साथ लीड रोल में अगस्त्य नंदा नजर आते हैं, जबकि जयदीप अहलावत ने एक अहम और प्रभावशाली भूमिका निभाई है।

 कहानी: जंग से आगे की सोच

फिल्म की कहानी भारतीय सेना के अधिकारी एम. एल. क्षेत्रपाल (धर्मेंद्र) से शुरू होती है। वह पाकिस्तान में होने वाली अपने कॉलेज की एलुमनी मीट में शामिल होने के लिए वहां जाना चाहते हैं। इसके पीछे उनकी एक और निजी इच्छा भी है,अपने पूर्वजों के उस घर को देखना, जिसे वे वर्षों पहले छोड़ आए थे।

पाकिस्तान पहुंचने पर उनकी मेहमाननवाज़ी करते हैं निसार (जयदीप अहलावत), जो खुद पाकिस्तानी सेना में अधिकारी हैं। निसार उन्हें अपने घर ठहराते हैं और उनके पुश्तैनी मकान तक ले जाते हैं। इस यात्रा के दौरान निसार की बेटी भी साथ होती है, जो कहानी को मानवीय भावनाओं से जोड़ती है।

कहानी का भावनात्मक मोड़ तब आता है, जब यह खुलासा होता है कि 1971 की जंग में एम. एल. क्षेत्रपाल का बेटा अरुण क्षेत्रपाल (अगस्त्य नंदा) पाकिस्तान में लड़ते हुए शहीद हो गया था। एक पिता की अंतिम इच्छा होती है कि वह उस जगह को देखे, जहां उसका बेटा देश के लिए कुर्बान हुआ। निसार भी एक पिता होने के नाते इस भावना को समझता है, लेकिन वह खुद एक गहरे द्वंद्व से जूझता रहता है।

फिल्म धीरे-धीरे यह सवाल उठाती है कि सरहदों की लड़ाई में मरने वाला सैनिक आखिर किसी न किसी का बेटा ही तो होता है।

 अभिनय: अनुभव बनाम संयम

धर्मेंद्र अपने सीमित स्क्रीन टाइम में भी गहरी छाप छोड़ते हैं। उम्र और अनुभव उनके अभिनय में सहजता के साथ झलकता है। यह किरदार एक पिता, एक सैनिक और एक इंसान—तीनों रूपों में असर छोड़ता है।

अगस्त्य नंदा का अभिनय संयमित और सधा हुआ है। वे ओवरएक्टिंग से दूर रहते हैं और एक युवा सैनिक की मासूमियत और साहस को संतुलन के साथ पेश करते हैं। कई दृश्यों में उनकी झलक उनके मामा अभिषेक बच्चन की याद दिलाती है।

जयदीप अहलावत फिल्म की जान हैं। उनके हाव-भाव, संवाद अदायगी और आंतरिक संघर्ष दर्शक को बांधे रखते हैं। आमतौर पर पाकिस्तान से जुड़े किरदारों को एकतरफा तरीके से दिखाया जाता है, लेकिन जयदीप का अभिनय उस सोच को तोड़ता है।

सिमर भाटिया अपने सीमित रोल में ठीक-ठाक प्रभाव छोड़ती हैं, जबकि सहायक कलाकार—सिकंदर खेर, राहुल देव, विवान शाह और एकावली खन्ना—कहानी को मजबूती देते हैं।

 निर्देशन और तकनीकी पक्ष

निर्देशक श्रीराम राघवन ने इस फिल्म को शोरगुल वाले देशभक्ति सिनेमा से अलग रखने की कोशिश की है। यहां न तो अनावश्यक पाकिस्तान-बैशिंग है और न ही ज़बरदस्ती का एक्शन। फिल्म का टोन गंभीर और संवेदनशील है।

संगीत कहानी के मूड के साथ चलता है और कहीं भी हावी नहीं होता। सिनेमैटोग्राफी सादगी के साथ दोनों देशों के माहौल को उभारती है।

 फिल्म की कमज़ोरियां

  • आज के लार्जर-दैन-लाइफ सिनेमा के दौर में दर्शकों को यह फिल्म धीमी लग सकती है।

  • पटकथा कुछ जगहों पर स्पष्ट दिशा नहीं पकड़ पाती—कभी यह वीर सैनिक की कहानी बनती है, तो कभी सरहद के पार की इंसानियत की।

  • एक शहीद की कुर्बानी जैसे विषय को और मजबूत लेखन की जरूरत थी, जो कुछ दृश्यों में कमजोर पड़ती है।

फिल्म की खूबियां

  • धर्मेंद्र को आखिरी बार बड़े पर्दे पर देखना भावुक अनुभव है।

  • फिल्म जंग को जीत-हार की बजाय मानवीय नजरिए से देखती है।

  • निर्देशक का साहस कि उन्होंने नफरत की जगह इंसानियत को चुना।

  • जयदीप अहलावत का दमदार और संवेदनशील अभिनय।

  • संतुलित निर्देशन और गंभीर टोन।

इक्कीस उन दर्शकों के लिए है जो शोर से दूर, भावनाओं और सोच को छूने वाली फिल्में पसंद करते हैं। यह फिल्म बताती है कि सरहदें भले देशों को बांट दें, लेकिन दर्द, बलिदान और पिता का प्रेम हर जगह एक जैसा होता है।

 रेटिंग: 3 / 5

कलाकार: धर्मेंद्र, अगस्त्य नंदा, सिमर भाटिया, जयदीप अहलावत, सिकंदर खेर, राहुल देव, विवान शाह, एकावली खन्ना
निर्देशन: श्रीराम राघवन

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