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21 साल का वर्चस्व टूटा, अब बिस्कोमान में ‘विशाल’ जीत

21 साल का वर्चस्व टूटा, अब बिस्कोमान में ‘विशाल’ जीत

Bihar Desk: बिहार की सहकारिता राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। एनसीसीएफ के चेयरमैन और बीजेपी नेता विशाल सिंह ने बिस्कोमान अध्यक्ष पद का चुनाव जीत लिया है। उन्होंने राजद नेता सुनील सिंह की पत्नी वंदना सिंह को हराकर 21 साल पुराना वर्चस्व तोड़ा है। झारखंड हाईकोर्ट द्वारा मतगणना पर लगी रोक हटने के बाद पटना डीएम ने चुनाव परिणाम जारी कर दिया, जिसमें विशाल सिंह की जीत की औपचारिक घोषणा हुई। उनके साथ महेश राय उपाध्यक्ष चुने गए हैं।

राजनीति में विरासत का असर
विशाल सिंह न केवल भाजपा के उभरते चेहरे हैं, बल्कि सहकारिता राजनीति में उनका पारिवारिक दखल गहरा है। उनके दादा तपेश्वर सिंह बिस्कोमान के संस्थापक सदस्य रहे और दो बार कांग्रेस से लोकसभा सांसद चुने गए। पिता अजित सिंह 2004 में बिक्रमगंज से जेडीयू सांसद बने और 2007 में एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया। इसके बाद मां मीना सिंह ने उपचुनाव जीता और 2009 में आरा से सांसद बनीं। 2023 में मीना सिंह और विशाल सिंह जेडीयू छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे।

चुनाव से पहले हाईकोर्ट की रोक
बिस्कोमान चुनाव लंबे समय से विवादों में था। कई बार तारीखें बदली गईं। जब मतदान हुआ तो राजद नेता सुनील सिंह ने झारखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर की और मतगणना पर रोक लगवा दी। मंगलवार को कोर्ट ने रोक हटा दी जिससे रास्ता साफ हुआ और परिणाम जारी किए गए। सुनील सिंह राबड़ी देवी के मुंहबोले भाई और राजद के विधान पार्षद हैं। वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मिमिक्री के चलते विधान परिषद से बर्खास्त हुए थे लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बहाल हुए।

भाजपा को सहकारिता में बड़ी बढ़त
विशाल सिंह दो साल पहले ही एनसीसीएफ के निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए थे। वे भाजपा के प्रभावशाली नेता बृजभूषण शरण सिंह के दामाद भी हैं। इस चुनाव में उनकी जीत को भाजपा के लिए सहकारिता क्षेत्र में बड़ी रणनीतिक सफलता माना जा रहा है। वहीं, राजद के लिए यह एक गंभीर झटका है क्योंकि वंदना सिंह पिछले दो दशकों से बिस्कोमान पर काबिज थीं।

सहकारिता में नए दौर की शुरुआत
विशाल सिंह की जीत सिर्फ एक पद की जीत नहीं है, यह सहकारिता क्षेत्र में परिवारवादी वर्चस्व के खिलाफ एक नई लहर का संकेत है। यह बताता है कि अब संगठित सियासी ताकतें सहकारिता संस्थाओं पर मजबूत पकड़ बनाने की दिशा में बढ़ रही हैं। आने वाले समय में यह बदलाव बिहार की राजनीति को नई दिशा दे सकता है।

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