पटना, 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सूबे की सियासत में वक्फ कानून बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है। मोदी सरकार द्वारा लागू किए गए नए वक्फ कानून के समर्थन और विरोध में राज्य के राजनीतिक दल दो धड़ों में बंट चुके हैं। मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्रों में यह कानून चुनावी विमर्श के केंद्र में है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि बिहार का मुस्लिम वोटर इस बार किसके साथ जाएगा?
17.7% वोट, 48 सीटों पर सीधा असर
बिहार में मुस्लिम आबादी 17.7 फीसदी है, और राज्य की 243 विधानसभा सीटों में से करीब 48 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। सीमांचल के किशनगंज जैसे इलाके में तो मुस्लिम आबादी 70% से ज्यादा है। इन सीटों पर मुस्लिमों की राजनीतिक पसंद किसी भी दल की किस्मत तय कर सकती है।
वक्फ कानून ने बढ़ाई सियासी गर्मी
नए वक्फ कानून को लेकर बीजेपी समर्थक दलों—नीतीश कुमार की जेडीयू, चिराग पासवान की एलजेपी (आर), और जीतनराम मांझी की हम पार्टी—ने संसद में सरकार का साथ दिया था। इसके चलते विपक्षी दलों ने इन दलों को मुस्लिम विरोधी करार देना शुरू कर दिया है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों ने विरोध की कमान संभाली है। मुस्लिम संगठनों के समर्थन में आरजेडी, कांग्रेस और वामपंथी दल खुलकर खड़े नजर आ रहे हैं।
नीतीश और चिराग को नुकसान का खतरा
वक्फ कानून को लेकर जेडीयू और एलजेपी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। मुस्लिमों का यह मानना है कि अगर नीतीश, चिराग और मांझी का समर्थन नहीं होता, तो बीजेपी अकेले इस बिल को पारित नहीं करा सकती थी। अब यही समर्थन नीतीश और चिराग को भारी पड़ सकता है। रमजान के दौरान मुस्लिमों को साधने के लिए आयोजित की गई इफ्तार पार्टियां भी मुस्लिम समुदाय को प्रभावित नहीं कर पाईं। नाराजगी इतनी बढ़ चुकी है कि मुस्लिम नेताओं ने जेडीयू से दूरी बनानी शुरू कर दी है।
आरजेडी को मिल सकता है फायदा
आरजेडी प्रमुख लालू यादव और उनके बेटे तेजस्वी यादव वक्फ कानून के खिलाफ मुखर होकर मुस्लिम समुदाय के साथ खड़े हैं। तेजस्वी ने खुले मंच से मुस्लिम संगठनों का समर्थन किया और उन्हें भरोसा दिलाया कि आरजेडी उनके साथ है। इस रणनीति से आरजेडी मुस्लिम वोट बैंक को फिर से पूरी तरह अपने पक्ष में करने में सफल हो सकती है।
कांग्रेस और ओवैसी की भी निगाह
कांग्रेस भी संसद से सड़क तक वक्फ कानून का विरोध कर रही है। पार्टी ने इसे बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीति का हिस्सा बताया है। वहीं, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी अपने आक्रामक तेवरों के लिए जाने जाते हैं और सीमांचल में खासा प्रभाव रखते हैं। प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी भी मुस्लिम मुद्दों पर सक्रिय है, जिससे मुकाबला बहुकोणीय हो गया है।
क्या करेंगे बिहार के मुसलमान?
2020 के चुनाव में जेडीयू को मुस्लिम वोट कुछ हद तक मिले थे, लेकिन बीजेपी के साथ लंबे समय तक गठजोड़ और अब वक्फ कानून के समर्थन ने मुस्लिमों को और दूर कर दिया है। ऐसे में 2025 का चुनाव नीतीश और चिराग के लिए कड़ी चुनौती बन सकता है। आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन, ओवैसी और प्रशांत किशोर की सियासत से साफ है कि मुस्लिम वोट के लिए जोरदार संघर्ष होगा।
वक्फ कानून की पहली सियासी परीक्षा बिहार में है, और यह तय करेगा कि 2025 में मुस्लिम वोट किसके साथ जाएगा—सत्ता के साथ या विपक्ष के साथ।




