वक्फ संशोधन पर सुप्रीम कोर्ट में घमासान, कांग्रेस नेता जावेद और ओवैसी ने बताई ‘धार्मिक आज़ादी’ पर चोट

वक्फ संशोधन पर सुप्रीम कोर्ट में घमासान, कांग्रेस नेता जावेद और ओवैसी ने बताई ‘धार्मिक आज़ादी’ पर चोट

नई दिल्ली: वक्फ संशोधन विधेयक को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत में अब कानूनी जंग शुरू हो गई है। कांग्रेस सांसद और लोकसभा में पार्टी के सचेतक मोहम्मद जावेद ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर इस विधेयक को मुस्लिम समुदाय के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है। याचिका में इसे धर्म, संपत्ति और समानता से जुड़े संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ करार दिया गया है।

जावेद ने दावा किया है कि वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 न सिर्फ मुस्लिम समुदाय के खिलाफ भेदभावपूर्ण है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 15 (भेदभाव के विरुद्ध अधिकार), 25 (धर्म की स्वतंत्रता), 26 (धार्मिक संस्थाओं का प्रबंधन) और 300A (संपत्ति का अधिकार) का स्पष्ट उल्लंघन करता है।

अभी कानून नहीं बना, फिर कोर्ट की दहलीज़ पर क्यों?
हालांकि यह अधिनियम फिलहाल राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार कर रहा है, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने इसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए दलील दी है कि यदि यह कानून बनता है तो मुस्लिम समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थागत स्वायत्तता पर गहरी चोट पहुंचेगी। सुप्रीम कोर्ट में जावेद के साथ-साथ एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी इसी संशोधन के खिलाफ याचिका दाखिल की है।

कानून के अनुसार, जब तक कोई विधेयक राष्ट्रपति से मंजूरी प्राप्त नहीं करता, तब तक वह कानून नहीं माना जाता और सुप्रीम कोर्ट उसमें न्यायिक समीक्षा नहीं कर सकता। बावजूद इसके, याचिकाकर्ताओं ने इसे ‘अत्यावश्यक हस्तक्षेप’ की श्रेणी में रखा है।

क्या हैं याचिका के मुख्य तर्क?
जावेद द्वारा अधिवक्ता अनस तनवीर के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया है कि यह संशोधन इस्लामिक कानून, परंपरा और धार्मिक अभ्यास की बुनियादी समझ का उल्लंघन करता है। याचिका में यह विशेष रूप से कहा गया है कि विधेयक ऐसे लोगों के अधिकारों को सीमित करता है जिन्होंने हाल में इस्लाम धर्म स्वीकार किया है और धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए संपत्ति समर्पित करना चाहते हैं।

इसके अलावा, संशोधन के जरिए वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने के प्रस्ताव को ‘धार्मिक शासन में अनुचित हस्तक्षेप’ करार दिया गया है। याचिका में सवाल उठाया गया है कि जब हिंदू धार्मिक ट्रस्टों का संचालन विशेष रूप से हिंदू समुदाय द्वारा किया जाता है, तो वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिमों की भागीदारी का औचित्य क्या है?

चुनिंदा हस्तक्षेप या समानता का उल्लंघन?
याचिका में यह भी कहा गया है कि अन्य धार्मिक संस्थानों पर ऐसे कोई प्रतिबंध या हस्तक्षेप नहीं हैं, जिससे यह संशोधन मुस्लिम समुदाय को अलग तरीके से ट्रीट करने वाला और अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करने वाला बताया गया है।

क्या है वक्फ संशोधन विधेयक 2024?
यह विधेयक मूल वक्फ अधिनियम 1995 में व्यापक संशोधन करता है। इसमें वक्फ परिषद, राज्य वक्फ बोर्ड, मुतवल्ली और मुख्य कार्यकारी अधिकारियों की शक्तियों और कार्यक्षेत्र को पुनर्परिभाषित किया गया है। वक्फ संपत्तियों के प्रशासन, पंजीकरण और विवाद निपटान से जुड़ी प्रक्रियाओं में बदलाव प्रस्तावित हैं। वक्फ न्यायाधिकरणों को सिविल कोर्ट की जगह निर्णय देने की अधिकृत शक्ति भी दी गई है।

सियासी मोड़ भी संभावित
विधेयक को लेकर विपक्षी दलों में पहले से नाराजगी थी, लेकिन अब इसका सुप्रीम कोर्ट पहुंचना राजनीतिक तापमान बढ़ा सकता है। जावेद और ओवैसी दोनों ही इसे मुस्लिम समुदाय के अधिकारों पर हमला बता चुके हैं। आने वाले समय में इस मामले को लेकर न सिर्फ अदालत बल्कि संसद और सड़क पर भी बहस तेज होने के आसार हैं।

अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं कि वह इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या रुख अपनाता है, और क्या यह याचिकाएं राष्ट्रपति की मंजूरी से पहले ही किसी असर की दावेदार बन पाती हैं या नहीं।

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