उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अपने सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में शून्य सीटों पर सिमटने के बाद मायावती अब 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुट गई हैं। गिरते जनाधार को देखते हुए उन्होंने फिर से कांशीराम के सियासी मॉडल को अपनाने का फैसला किया है, जिसमें दलितों के साथ ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) को जोड़कर मजबूत बहुजन गठजोड़ बनाया गया था। लेकिन सवाल यह है कि क्या मौजूदा दौर में मायावती के लिए ओबीसी वोटों को साधना उतना ही आसान होगा, जितना कांशीराम के दौर में था?
बसपा का खिसकता जनाधार
2012 में सत्ता से बाहर होने के बाद बसपा लगातार कमजोर होती गई। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को मात्र 13% वोट मिले, और 2024 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 9.39% रह गया। खासकर गैर-जाटव दलित और ओबीसी समुदाय का बड़ा हिस्सा भाजपा और समाजवादी पार्टी की ओर शिफ्ट हो गया। ऐसे में मायावती ने अब पार्टी की पुरानी बहुजन राजनीति को फिर से धार देने का फैसला किया है।
दलित-ओबीसी गठजोड़ पर फोकस
मायावती ने हाल ही में ओबीसी और दलित नेताओं के साथ बैठक कर इस गठजोड़ को फिर से मजबूत करने की रणनीति बनाई। उन्होंने कहा कि बाबा साहब अंबेडकर के संघर्ष के अनुरूप बहुजन समाज को एकजुट किया जाएगा और भाजपा, कांग्रेस व सपा की “दलित-विरोधी और ओबीसी विरोधी” नीतियों को उजागर किया जाएगा।
बसपा की रणनीति में अब ओबीसी समाज के उन वर्गों को प्राथमिकता देने पर जोर है, जो भाजपा और सपा के समीकरण में हाशिए पर हैं। इनमें मौर्य, कुशवाहा, सैनी, पाल, राजभर, निषाद, बिंद, मल्लाह, गडरिया जैसी अति पिछड़ी जातियां शामिल हैं।
भाजपा और सपा से कड़ी चुनौती
हालांकि, मायावती के लिए यह राह आसान नहीं होगी। भाजपा ने पिछले एक दशक में गैर-यादव ओबीसी को अपनी राजनीति का केंद्र बना लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद ओबीसी समुदाय से आते हैं, और उनकी कैबिनेट में 29 मंत्री ओबीसी वर्ग से हैं। यूपी में भी योगी सरकार में 21 ओबीसी मंत्री हैं।
सपा भी “पीडीए” (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले पर काम कर रही है। अखिलेश यादव ने ओबीसी के बड़े वर्ग को साधने के लिए कुर्मी, कोइरी, लोध, पाल, राजभर जैसी जातियों पर फोकस किया है। 2024 के चुनाव में इस रणनीति ने असर दिखाया और सपा गठबंधन को सफलता मिली।
ओबीसी वोटों पर किसकी मजबूत पकड़?
यूपी में ओबीसी समुदाय का 52% वोट बैंक है, जिसमें गैर-यादव ओबीसी 43% हैं। ये जातियां किसी एक पार्टी के साथ स्थायी रूप से नहीं रहतीं, लेकिन भाजपा और सपा ने इन्हें लुभाने के लिए सटीक रणनीति अपनाई है।
यादव (11%) सपा के कोर वोटर हैं, जबकि कुर्मी (7%), मौर्य-कुशवाहा-सैनी (6%), लोध (4%), पाल (3%), निषाद-बिंद-कश्यप (4%), जाट (3%), राजभर (2%) जैसे समूह भाजपा और सपा के बीच बंटे हुए हैं। ऐसे में मायावती को इन जातियों में फिर से अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी।
क्या बसपा फिर से खड़ा कर पाएगी पुराना बहुजन गठजोड़?
मायावती ने पार्टी संगठन में बड़े बदलाव किए हैं और ओबीसी नेताओं को प्रमुखता दी जा रही है। बसपा के नए जिलाध्यक्षों की सूची में ओबीसी समाज के नेताओं को प्राथमिकता मिली है। इससे साफ है कि मायावती कांशीराम के पुराने मॉडल को फिर से लागू करना चाहती हैं।
हालांकि, पिछले एक दशक में यूपी की राजनीति में बड़ा बदलाव आया है। भाजपा ने हिंदुत्व और विकास के मुद्दे के सहारे ओबीसी-दलित वोटों का बड़ा हिस्सा अपने पाले में कर लिया है। वहीं, सपा ने भी ओबीसी-दलित गठजोड़ को मजबूत करने की रणनीति बनाई है। ऐसे में बसपा को फिर से बहुजन समाज की गोलबंदी करने के लिए नए तरीके अपनाने होंगे।
2027 के चुनाव में बसपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह भाजपा और सपा के मजबूत ओबीसी समीकरण को कैसे तोड़ पाएगी। अगर मायावती कांशीराम के दौर की तरह अतिपिछड़ी जातियों में फिर से पैठ बना पाती हैं, तो बसपा एक बार फिर यूपी की राजनीति में बड़ी ताकत बन सकती है। लेकिन अगर वह इसमें सफल नहीं हो पातीं, तो बसपा का सियासी भविष्य और अधिक संकुचित हो सकता है।




