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मुस्लिम आरक्षण पर अखिलेश यादव के बदले सुर, सपा के लिए नुकसानदेह साबित होगा!,कांग्रेस से क्यों अलग है सपा का स्टैंड?

मुस्लिम आरक्षण पर अखिलेश यादव के बदले सुर, सपा के लिए नुकसानदेह साबित होगा!,कांग्रेस से क्यों अलग है सपा का स्टैंड?

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार द्वारा सरकारी ठेकों में मुसलमानों को 4% आरक्षण देने के फैसले पर समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव ने विरोध जताया है। धर्म के आधार पर आरक्षण को गलत बताते हुए अखिलेश ने कहा कि वह जातिगत जनगणना के पक्षधर हैं और पिछड़े तथा दलितों को उनके अधिकार मिलने चाहिए। यह बयान ऐसे समय में आया है जब बीजेपी कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगा रही है।

कर्नाटक में मुस्लिम आरक्षण और बीजेपी का विरोध
मार्च 2025 में कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने केटीपीपी (KTPP) एक्ट में संशोधन कर 2 करोड़ तक के सिविल कार्य और 1 करोड़ तक के सेवा कार्य से जुड़े सरकारी ठेकों में मुसलमानों के लिए 4% आरक्षण लागू करने का फैसला किया। यह आरक्षण ओबीसी की 2बी श्रेणी के तहत दिया गया है, जिसमें कर्नाटक के सभी मुस्लिम शामिल हैं।

बीजेपी ने इस फैसले को असंवैधानिक बताते हुए संसद से सड़क तक विरोध शुरू कर दिया। पार्टी का कहना है कि यह धर्म के आधार पर आरक्षण देने का प्रयास है, जिससे ओबीसी समुदाय के अन्य वर्गों का हक मारा जाएगा। वहीं, कांग्रेस इसे सामाजिक न्याय की दिशा में उठाया गया कदम बता रही है।

अखिलेश यादव ने क्यों किया मुस्लिम आरक्षण का विरोध?
अखिलेश यादव ने स्पष्ट किया कि वह धर्म के आधार पर आरक्षण के पक्ष में नहीं हैं। उनका मानना है कि आरक्षण जाति आधारित होना चाहिए, न कि धार्मिक आधार पर। हालांकि, यह रुख सपा के पुराने स्टैंड से अलग है। 2012 में जब सपा सत्ता में आई थी, तब पार्टी ने अपने घोषणापत्र में मुस्लिमों को 18% आरक्षण देने का वादा किया था। उस समय सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने संसद में भी इसके लिए संविधान संशोधन की मांग की थी।

लेकिन अब, अखिलेश यादव जातिगत जनगणना को प्राथमिकता दे रहे हैं। उनका कहना है कि सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता को जानने के लिए जातिगत जनगणना जरूरी है, जिससे सभी पिछड़े वर्गों को उनका हक मिल सके।

एम-वाई समीकरण से पीडीए फॉर्मूले की ओर शिफ्ट
सपा का सियासी सफर मुस्लिम-यादव (एम-वाई) गठजोड़ पर टिका रहा है, लेकिन 2017 के बाद बीजेपी के उभार से यह समीकरण कमजोर हुआ। अखिलेश ने अब पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला अपनाया है, जिसमें वह मुस्लिमों के बजाय ओबीसी और दलितों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।

इसका असर सपा की रणनीति में भी दिखा। 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश ने ओबीसी और दलित नेताओं को आगे कर बीजेपी से सीधी टक्कर ली। सपा का यह फॉर्मूला सफल भी रहा, जिससे पार्टी यूपी में मजबूत स्थिति में आई।

क्या मुस्लिम आरक्षण का विरोध सपा को नुकसान पहुंचाएगा?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मुस्लिम आरक्षण का विरोध सपा को भारी पड़ सकता है। 2022 के विधानसभा चुनाव में 87% मुस्लिम वोट सपा के खाते में गया था। 2024 में भी मुस्लिमों ने बीजेपी को हराने के लिए अखिलेश को समर्थन दिया।

यूपी में करीब 20% मुस्लिम आबादी है, जो 143 विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाती है। इनमें से 43 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम उम्मीदवार अपने दम पर जीत सकते हैं। पश्चिमी यूपी में मुस्लिम आबादी 26% से ज्यादा है, जबकि सात जिलों में यह 40% से ऊपर है। इन जिलों में सपा ने 2024 में अच्छा प्रदर्शन किया था।

अगर अखिलेश यादव मुस्लिम आरक्षण के खिलाफ खड़े रहते हैं, तो सपा के कोर वोट बैंक में दरार आ सकती है। हालांकि, यूपी में मुस्लिमों के पास सपा के अलावा कोई मजबूत विकल्प नहीं दिख रहा है, इसलिए वे फिलहाल पार्टी से दूर जाने की स्थिति में नहीं हैं।

अखिलेश यादव का मुस्लिम आरक्षण पर विरोध जताना उनकी बदली रणनीति का हिस्सा है। वह अब मुस्लिमों की सीधी पैरवी करने के बजाय ओबीसी और दलितों को प्राथमिकता दे रहे हैं। हालांकि, इससे सपा के परंपरागत मुस्लिम वोट बैंक में असमंजस की स्थिति पैदा हो सकती है।

अगर यूपी में कोई नया मुस्लिम नेतृत्व उभरता है, तो सपा को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है। लेकिन फिलहाल, बीजेपी को रोकने के लिए मुस्लिम मतदाता सपा के साथ बने रहने के लिए मजबूर नजर आ रहे हैं।

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