बिहार की राजनीति में बदलाव की बयार, ‘जनरेशन चेंज’ की लहर, अबकी बार युवाओं की बहार

बिहार की राजनीति में बदलाव की बयार, ‘जनरेशन चेंज’ की लहर, अबकी बार युवाओं की बहार

बिहार की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत हो रही है। दशकों तक राज्य की राजनीति पर लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान का वर्चस्व रहा, लेकिन अब नई पीढ़ी के नेता सामने आ रहे हैं। तेजस्वी यादव, चिराग पासवान, निशांत कुमार, प्रशांत किशोर, मुकेश सहनी और कन्हैया कुमार जैसे युवा नेता बिहार की राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

जनरेशन चेंज: पुरानी सियासत से बाहर निकलने की तैयारी
सत्तर के दशक में जेपी आंदोलन से राजनीति में आए लालू यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान ने बिहार की राजनीति को दशकों तक प्रभावित किया। रामविलास पासवान और सुशील मोदी का निधन हो चुका है, लालू यादव स्वास्थ्य और कानूनी समस्याओं से जूझ रहे हैं, और नीतीश कुमार की सेहत को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में बिहार की राजनीति में नई पीढ़ी की एंट्री स्वाभाविक है।

तेजस्वी यादव: लालू यादव के सियासी वारिस
लालू प्रसाद यादव ने बिहार की राजनीति पर दशकों तक राज किया। चारा घोटाले के कारण उनकी राजनीतिक साख को झटका लगा, लेकिन उन्होंने अपने बेटे तेजस्वी यादव को सियासी मैदान में उतारकर अपनी विरासत को आगे बढ़ाने की नींव रखी।

तेजस्वी यादव आरजेडी के सबसे बड़े नेता हैं और 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने खुद को एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित किया। वे दो बार उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं और वर्तमान में बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। 2025 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की कमान पूरी तरह से उनके हाथों में होगी। अगर महागठबंधन सत्ता में लौटता है, तो तेजस्वी ही मुख्यमंत्री बन सकते हैं।

चिराग पासवान: पिता की विरासत बचाने की जंग
रामविलास पासवान ने बिहार में दलित राजनीति को नई दिशा दी थी। उनके निधन के बाद उनके बेटे चिराग पासवान को राजनीतिक संघर्ष करना पड़ा। उन्हें अपने चाचा पशुपति पारस से पार पाने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी।

चिराग पासवान फिलहाल केंद्र सरकार में मंत्री हैं और एनडीए गठबंधन का हिस्सा हैं। 2025 के चुनाव में वे भाजपा के साथ मिलकर लड़ने की योजना बना रहे हैं। उनकी कोशिश बिहार की राजनीति में “किंगमेकर” बनने की है, जिसके लिए वे अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं।

निशांत कुमार: क्या संभालेंगे नीतीश की विरासत?
नीतीश कुमार पिछले दो दशकों से बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे हैं। हालांकि, उनकी सेहत को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। उनके बेटे निशांत कुमार अब धीरे-धीरे सियासी सक्रियता बढ़ा रहे हैं।

हालांकि, निशांत ने अभी तक औपचारिक रूप से राजनीति में कदम नहीं रखा है, लेकिन 2025 के विधानसभा चुनावों में उनकी भूमिका बढ़ सकती है। जेडीयू के नेता भी उन्हें राजनीति में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। अगर वे राजनीति में आते हैं, तो वे जेडीयू के स्टार प्रचारक बन सकते हैं।

प्रशांत किशोर, मुकेश सहनी और कन्हैया कुमार: तीसरी धारा के उभरते चेहरे
प्रशांत किशोर:
प्रशांत किशोर चुनावी रणनीतिकार के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं, लेकिन अब वे खुद राजनीति में उतर चुके हैं। उन्होंने अपनी पार्टी “जनसुराज” बनाई है और 2025 के चुनाव में पूरी ताकत से उतरने की तैयारी कर रहे हैं।

मुकेश सहनी:
मुकेश सहनी ओबीसी समाज के मल्लाह जाति से आते हैं और खुद को बिहार की राजनीति में किंगमेकर के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। 2020 में उन्होंने एनडीए के साथ चुनाव लड़ा था, लेकिन बाद में महागठबंधन में शामिल हो गए। 2025 के चुनाव में उनकी भूमिका अहम रहने वाली है।

कन्हैया कुमार:
जेएनयू के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार अब कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। उन्हें राहुल गांधी का करीबी माना जाता है। वे बिहार में कांग्रेस को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं और रोजगार व पलायन जैसे मुद्दों पर पदयात्रा निकाल रहे हैं। 2025 के चुनाव में कांग्रेस का प्रमुख चेहरा बनने की संभावना है।

बिहार की राजनीति में युवाओं की बहार
बिहार की राजनीति में युवा नेतृत्व की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। आरजेडी ने तेजस्वी यादव, तेजप्रताप यादव और मीसा भारती को आगे बढ़ाया है, तो एलजेपी चिराग पासवान के नेतृत्व में आगे बढ़ रही है। कांग्रेस ने कन्हैया कुमार को प्रमुख चेहरा बनाया है, जबकि जेडीयू के निशांत कुमार भी राजनीति में एंट्री की तैयारी में हैं।

बीजेपी के पास डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी युवा चेहरे के रूप में मौजूद हैं। ऐसे में सभी पार्टियां युवाओं को आगे लाने की रणनीति अपना रही हैं।

बिहार में युवाओं का नया वोट बैंक
बिहार की कुल आबादी लगभग 15 करोड़ है, जिसमें से 58% लोग 25 साल से कम उम्र के हैं। यह नई पीढ़ी जाति और धर्म की राजनीति से ज्यादा रोजगार और विकास पर ध्यान देती है।

2020 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनावों में तेजस्वी यादव ने इस ट्रेंड को पहचाना और रोजगार और पलायन को मुख्य मुद्दा बनाया। इसका फायदा उन्हें मिला। नीतीश कुमार भी इस ट्रेंड को समझ चुके हैं और अपने भाषणों में लाखों नौकरियां देने की बात कह रहे हैं।

कांग्रेस ने कन्हैया कुमार के नेतृत्व में पदयात्रा शुरू की है, जिसका मुख्य मुद्दा भी शिक्षा और रोजगार है।

क्या 2025 में होगा युवा नेताओं का युग?
बिहार की राजनीति में इस बार जनरेशन चेंज का दौर दिख रहा है। 2025 के विधानसभा चुनाव में यह साफ हो जाएगा कि क्या युवा नेता वास्तव में सत्ता की बागडोर संभाल सकते हैं या फिर पुराने दिग्गजों की छाया में ही रहेंगे।

तेजस्वी यादव, चिराग पासवान, निशांत कुमार, प्रशांत किशोर, मुकेश सहनी और कन्हैया कुमार जैसे नेता इस चुनाव में अपनी ताकत दिखाने के लिए तैयार हैं। 2025 का बिहार विधानसभा चुनाव तय करेगा कि बिहार की राजनीति की नई दिशा क्या होगी और क्या युवा नेताओं की यह बहार वाकई में सत्ता परिवर्तन ला सकेगी या नहीं।

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