प्रयागराज, महाकुंभ में इस बार का नज़ारा और भी खास है। यहां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर साधु-संतों की भीड़ के बीच विदेशी साधु-संत भी सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार में जुटे नज़र आ रहे हैं। सात समंदर पार से आए ये विदेशी संत सनातन धर्म की अद्वितीय परंपराओं और अध्यात्म से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना देश, परिवार और भौतिक सुख-सुविधाएं छोड़कर सनातन को अपना जीवन समर्पित कर दिया।
अमेरिका, इटली, फ्रांस, जर्मनी और अन्य देशों से आए ये साधु महाकुंभ में भारी आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। विदेशी नागरिकों को भगवा वस्त्रों में, जटाजूट और तिलक धारण किए देखकर लोग आश्चर्यचकित हो रहे हैं। इनमें से कई संत वर्षों से भारत में रह रहे हैं और सनातन धर्म की गहराइयों को समझने के लिए विभिन्न गुरुकुलों और आश्रमों में अध्ययन कर रहे हैं।
इटली से आए स्वामी अच्युतानंद बताते हैं कि उन्होंने 20 साल पहले भारत का रुख किया था। योग और वेदांत में गहरी रुचि के चलते वे सनातन धर्म की ओर आकर्षित हुए। महाकुंभ में वे कई धार्मिक प्रवचनों का हिस्सा बन रहे हैं और विदेशी भक्तों को भी सनातन धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे रहे हैं।
वहीं, अमेरिका से आईं साध्वी गौरीकृष्णा का कहना है कि भारत की पवित्रता और अध्यात्म ने उनकी ज़िंदगी बदल दी। वे पहले एक सफल व्यवसायी थीं, लेकिन सनातन धर्म से जुड़ने के बाद उन्होंने जीवन को नई दिशा दी।
इन विदेशी साधु-संतों का कहना है कि सनातन धर्म केवल भारतीयों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी मानवता के कल्याण का मार्ग दिखाता है। वे अपने-अपने देशों में सनातन के प्रचार-प्रसार के लिए पुस्तकें लिख रहे हैं, ऑनलाइन माध्यमों से धर्म का संदेश फैला रहे हैं और वहां के लोगों को भारतीय संस्कृति और धर्म की ओर आकर्षित कर रहे हैं।
महाकुंभ में इन विदेशी संतों का आगमन यह साबित करता है कि सनातन धर्म की महानता और गहराई सीमाओं से परे है। गंगा किनारे इन संतों का समर्पण, तप और सेवा देखकर लोग दंग रह जाते हैं। महाकुंभ में विदेशी साधु-संतों की उपस्थिति इस धर्म के वैश्विक प्रभाव का प्रमाण है।




