प्रयागराज, महाकुंभ के दौरान नागा साधुओं की उपस्थिति हमेशा से ही लोगों के लिए जिज्ञासा का विषय रही है। नागा साधु, अपने विशिष्ट रूप और रहस्यमयी जीवनशैली के लिए प्रसिद्ध हैं। महाकुंभ में वे विशेष रूप से दिखाई देते हैं और उसके बाद अचानक गायब हो जाते हैं, जिससे उनके जीवन के रहस्यों के प्रति लोगों की उत्सुकता और बढ़ जाती है।
नागा साधुओं की गुप्त दुनिया
महाकुंभ में सबसे पहले स्नान करने के लिए नागा साधुओं का जुलूस आता है। ये साधु अपने शरीर पर धुनि और राख मलते हैं, माथे पर टीका लगाते हैं और दिगंबर वेश धारण करते हैं। उनकी उपस्थिति अद्वितीय होती है, जो जनमानस को अपनी ओर खींचती है। महाकुंभ के बाद वे कहां चले जाते हैं, यह एक बड़ा रहस्य है। कई साधु प्रयागराज, काशी, उज्जैन, हिमालय की गुफाओं, और हरिद्वार के दूरस्थ क्षेत्रों में निवास करते हैं और साधना में लीन रहते हैं।
नागा साधुओं की कठोर ट्रेनिंग
नागा साधु बनने की प्रक्रिया महाकुंभ, अर्द्धकुंभ, और सिंहस्थ कुंभ के दौरान शुरू होती है। उनकी ट्रेनिंग अत्यंत कठोर होती है, जिसे किसी भी प्रकार की कमांडो ट्रेनिंग से कम नहीं माना जा सकता। नागा साधुओं के कुल 13 अखाड़े हैं, जिनमें से 7 अखाड़े—जूना, महानिर्वाणी, निरंजनी, अटल, अग्नि, आनंद, और आह्वान—कठोर प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। ये अखाड़े साधुओं को शास्त्र विद्या में निपुण बनाते हैं और उन्हें तपस्या के कठोर नियमों का पालन करने के लिए प्रशिक्षित करते हैं।
‘अखाड़ा’ शब्द की उत्पत्ति और मुगलकालीन कनेक्शन
‘अखाड़ा’ शब्द की उत्पत्ति मुगल काल से मानी जाती है। इससे पहले साधुओं के समूह को ‘बेड़ा’ या ‘जत्था’ कहा जाता था। मुगल काल में ‘अखाड़ा’ शब्द उन दलों के लिए प्रयोग होने लगा, जो शास्त्र और युद्ध कौशल में निपुण होते थे। यह शब्द सैन्य संगठन से लिया गया था, जहां सैनिकों को विशेष युद्ध कौशल का प्रशिक्षण दिया जाता था। बाद में, साधुओं के संगठन भी इस शब्द को अपनाने लगे।
नागा साधुओं की पदवी और संप्रदाय
‘नागा’ एक पदवी है, जो वैष्णव, शैव, और उदासीन संप्रदायों के भीतर विभाजित होती है। प्रत्येक संप्रदाय के अपने अलग अखाड़े होते हैं। अधिकतर नागा साधु शैव संप्रदाय से आते हैं और निर्वस्त्र रहते हैं। हालांकि, वस्त्रधारी साधु भी नागा साधु हो सकते हैं। नागा साधुओं को उनकी कठोर तपस्या और अनुशासन के लिए जाना जाता है।
नागा साधुओं का जीवन और उनका अखाड़ों से संबंध महाकुंभ में श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनता है। उनका रहस्यमयी और तपस्वी जीवन सनातन धर्म की पुरानी परंपराओं को जीवित रखता है और आज भी अनगिनत भक्तों को प्रेरणा देता है।




