महाकुंभ में 9 अतरंगी बाबाओं का जलवा: अनोखे अंदाज से बने आकर्षण का केंद्र

प्रयागराज, महाकुंभ 2025 का आयोजन अपने आप में विशेष है, लेकिन इस बार यहां आए 9 अतरंगी बाबा अपने अनोखे अंदाज के कारण खास आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। इन बाबाओं की वेशभूषा, जीवनशैली, और धार्मिक अनुशासन ने श्रद्धालुओं के साथ-साथ पर्यटकों का ध्यान भी खींचा है। हर बाबा की अपनी एक खासियत है, जो उन्हें दूसरों से अलग बनाती है।

फसल वाले बाबा अपने अनोखे अंदाज के लिए जाने जाते हैं। वे हमेशा खेतों में उगाई गई ताजी फसलों के साथ दिखाई देते हैं। उनकी मान्यता है कि प्राकृतिक उपज से जीवन में संतुलन और समृद्धि आती है। श्रद्धालु उनके पास जाकर आशीर्वाद लेते हैं और उनके द्वारा दी गई फसलों को अपने घर ले जाते हैं।

रुद्राक्ष बाबा का पहनावा उन्हें खास बनाता है। वे सिर से पांव तक रुद्राक्ष की मालाओं से लदे रहते हैं। उनकी मान्यता है कि रुद्राक्ष भगवान शिव का आशीर्वाद है और इसे धारण करने से आध्यात्मिक उन्नति होती है। लोग उनके पास जाकर रुद्राक्ष की माला पहनते हैं और शिव भक्ति में लीन हो जाते हैं।

महाकाल गिरी बाबा खुद को भगवान महाकाल का भक्त बताते हैं। वे हमेशा महाकालेश्वर मंदिर के अनुकरण में नृत्य करते और मंत्रों का जाप करते रहते हैं। उनकी भक्ति और महाकाल के प्रति अटूट श्रद्धा ने उन्हें विशेष स्थान दिलाया है।

चाबी वाले बाबा अपने साथ हमेशा चाबियों का एक गुच्छा रखते हैं। उनका मानना है कि ये चाबियां जीवन के विभिन्न रहस्यों को खोलती हैं। श्रद्धालु उनसे जीवन की समस्याओं के समाधान के लिए चाबियों का आशीर्वाद लेते हैं।

चाय वाले बाबा हमेशा अपने भक्तों को चाय पिलाने के लिए तैयार रहते हैं। उनका मानना है कि चाय में आध्यात्मिक ऊर्जा होती है, जो थकान दूर करती है और मन को शांति देती है।

छोटू बाबा का कद भले ही छोटा हो, लेकिन उनकी ऊर्जा और धार्मिक ज्ञान अद्वितीय है। वे अपने उपदेशों से लोगों को प्रेरित करते हैं और धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या करते हैं।

बवंडर बाबा हमेशा तेज हवा की धारा में नाचते रहते हैं। उनका मानना है कि हवा की शक्ति से जीवन में नई ऊर्जा आती है। उनके इस अनोखे अंदाज से लोग उन्हें बवंडर बाबा कहने लगे हैं।

टार्ज़न बाबा जंगल के जीवन को जीते हैं। वे पेड़ों पर चढ़ते, जानवरों के साथ रहते और प्रकृति के करीब रहकर साधना करते हैं।

कबूतर वाले बाबा हमेशा अपने साथ कबूतर रखते हैं। उनकी मान्यता है कि कबूतर शांति और प्रेम के प्रतीक हैं। लोग उनके पास जाकर कबूतरों को दाना खिलाते और उनसे आशीर्वाद लेते हैं।

इन नौ बाबाओं ने महाकुंभ को एक अनोखा रंग दिया है। उनकी अलग-अलग विशेषताओं ने श्रद्धालुओं को आकर्षित किया है और वे सभी के बीच चर्चा का विषय बन गए हैं।

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