Karnatak Hijab Controversy: जानिये हाईकोर्ट में हुईं 11 सुनवाइयों में दी गयीं क्या-क्या दलीलें

Karnatak Hijab Controversy: जानिये हाईकोर्ट में हुईं 11 सुनवाइयों में दी गयीं क्या-क्या दलीलें

बेंगलुरू। हिजाब को लेकर जनवरी से देशभर में गरमाया विवाद (Hijab Row) आज कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले (Karnataka High court Virdict) के बाद खत्म हो गया। चीफ जस्टिस रितुराज अवस्थी, जस्टिस कष्णा एस दीक्षित और जस्टिस एम खाजी की तीन सदस्यीय बेंच ने 11 दिन सुनवाई के बाद 25 फरवरी को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे आज 15 मार्च 2022 को सुनाया गया। छात्राओं के वकीलों ने तर्क दिया था कि हिजाब इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा है, लेकिन सरकार की दलीलों के आगे छात्राओं के वकीलों की एक नहीं चली। हाईकोर्ट ने फैसले में कहा कि हिजाब इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा का हिस्सा नहीं है। पढ़ें, 11 दिन की सुनवाई में किस तरह से इसे अनिवार्य धार्मिक प्रथा बताने के लिए कुरान से लेकर कोर्ट तक का हवाला दिया गया।

पहला दिन : 10 फरवरी को सुनवाई शुरू हुई। इसमें छात्राओं के वकीलों ने मांग रखी कि जब तक कोर्ट हिजाब पर फैसला नहीं सुना देता तब तक छात्राओं को स्कूल-काॅलेजों में हिजाब पहनकर आने की अनुमति दी जाए, क्योंकि यह इस्लाम का अनिवार्य धार्मिक हिस्सा है। हालांकि, कोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए फैसला आने तक किसी भी तरह के धार्मिक परिधान पहनकर आने पर रोक लगा दी। अगले दिन इसे सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला आने तक इंतजार करने को कहा।

दूसरा दिन : छात्राओं के वकील ने तर्क किया कि सरकार का आदेश कानून के तहत सही नहीं है। ये कानूनी रूप से टिकने वाला नहीं है। शासनादेश में कहा गया है कि हिजाब पहनना अनुच्छेद 25 द्वारा संरक्षित नहीं है। वकील संजय हेगड़े (Sanjay Hegde) ने कहा कि यह केवल धार्मिक आस्था का मामला नहीं है, बल्कि इससे लड़कियों की शिक्षा का सवाल भी जुड़ा हुआ है। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा– हमने आपकी बात समझ ली है कि कर्नाटक एजुकेशन एक्ट में इसको लेकर प्रावधान नहीं है। मामला तूल पकड़ता देख सरकार ने 16 फरवरी तक स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए।

तीसरा दिन : छात्राओं के वकील ने कोर्ट में आरोप लगाए कि लड़कियों को स्कूल से निकाल दिया गया है। इस पर चीफ जस्टिस ने पूछा कि क्या उन्हें निष्कासित कर दिया गया है?  वकील ने कहा कि  उन्हें कक्षा में जाने की अनुमति नहीं दी जा रही है। दोनों का प्रभाव एक जैसा ही है। इस पर कोर्ट ने कहा कि निष्कासन एक बात है, प्रवेश की अनुमति नहीं देना दूसरी बात। अगर किसी यात्री के पास टिकट नहीं होने की वजह से ट्रेन में अंदर जाने की अनुमति नहीं है, तो यह निष्कासन नहीं है। ढाई घंटे चली दलीलों के बाद भी इस दिन कोई बात नहीं बनी। चीफ जस्टिस ने सुनवाई को अगले दिन के लिए आगे बढ़ा दिया।

चौथा दिन : छात्राओं के वकील ने सिखों की पगड़ी के साथ-साथ घूंघट, चूड़ियों और इसाइयों के क्रूस पर भी सवाल उठाया। कहा- नियम केवल एक विशेष वर्ग के लिए है। इस पर चीफ जस्टिस ने पूछा कि क्या हिजाब कभी यूनिफॉर्म का हिस्सा था, क्या पहले यूनिफॉर्म में कोई हिजाब निर्धारित किया गया था? हालांकि, छात्राओं के वकील इस सवाल का जवाब नहीं दे सके। उन्होंने कहा कि दूसरे समुदाय की लड़की छूट का दावा कर सकती है। हम नहीं कर सकते, हमें सुना भी नहीं जाता। हमें तुरंत सजा दी जाती है। क्या इससे अधिक कठोर उपाय हो सकता है? इस पर कोर्ट ने उनसे पूछा कि आपके प्रस्ताव के तहत क्या यूनिफॉर्म बिल्कुल नहीं होनी चाहिए? हालांकि, छात्राओं के वकील ने कहा कि ऐसा नहीं है, लेकिन अनेकता में एकता होना चाहिए। आदर्श वाक्य, बहुलता बनी रहे। अगर पगड़ी पहनने वाले सेना में हो सकते हैं, तो उनके धार्मिक चिन्ह वाले व्यक्ति को कक्षाओं में जाने की अनुमति क्यों नहीं दी जा सकती?

पांचवा दिन : छात्राओं के वकील कुलकर्णी ने कहा- हिजाब पर प्रतिबंध कुरान पर प्रतिबंध के समान है। पैगंबर की पत्नियों को भी हिजाब पहनना पड़ता है। इस पर चीफ जस्टिस ने पूछा- आपके लिए हिजाब और कुरान एक ही चीज हैं? कुलकर्णी ने कहा- मेरे लिए नहीं। पूरी दुनिया के लिए एक हैं। मैं एक भक्त ब्राह्मण हिंदू हूं। कुरान दुनिया भर में पूरे मुस्लिम समुदाय पर लागू होता है। चीफ जस्टिस ने उन्हें बताया कि हिजाब पर कोई बैन नहीं है। कुलकर्णी ने मांग की कि अदालत हिजाब की अनुमति नहीं देती है, तो यह कुरान पर प्रतिबंध लगाने के समान हो सकता है, अनावश्यक मुद्दे पैदा कर सकता है। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि कुरान में यह कहां लिखा है कि हिजाब मुस्लिम छात्राओं के लिए जरूरी है।

छठवां दिन : छात्राओं के वकीलों ने हिजाब पर प्रतिबंध को मुस्लिम छात्राओं के साथ भेदभाव बताया। इस पर महाधिवक्ता प्रभुलिंग नवदगी ने कहा– मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव के आरोप निराधार और तर्कहीन हैं। ड्रेस कोड किसी के अधिकारों को प्रभावित नहीं करता है। उन्होंने कहा कि यूनिफॉर्म सीडीसी ने तय किया है। इसमें स्थानीय विधायक, माता-पिता, छात्र प्रतिनिधि, अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के सदस्य आदि शामिल हैं। ड्रेस कोड का आदेश कर्नाटक शिक्षा अधिनियम की धारा 133 के तहत लागू किया गया है। कोई भी कॉलेज इस पर सवाल नहीं उठा रहे हैं, जबकि छात्राएं सवाल उठा रही हैं। उन्हें तो सवाल उठाने का अधिकार ही नहीं है। महाधिवक्ता ने बताया कि लड़कियों ने अनुशासन तोड़ा,इसलिए यूनिफॉर्म लागू करना पड़ा। वे प्रिंसिपल के पास जाकर उन्हें चेतावनी देकर आई थीं कि हिजाब पहनकर ही कॉलेज आएंगी।

सातवां दिन : कर्नाटक सरकार के महाधिवक्ता प्रभुलिंग नवदगी ने सुप्रीम कोर्ट के हवाले से बताया कि अनुच्छेद 25 के हिसाब से हिजाब ‘आवश्यक’ नहीं है। यह केवल धार्मिक अभ्यास है। अनुच्छेद 25 धार्मिक प्रथाओं के संरक्षण की बात करता है न कि धार्मिक अभ्यास के बारे में। धर्म वास्तव में क्या है यह परिभाषित करना असंभव है। शिरूर मठ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्टैंड लिया कि जो अनिवार्य रूप से धार्मिक है वह संरक्षित है। सबरीमाला मामले में कोर्ट कहा कि आपको यह बताना होगा कि जिस प्रथा को आप संरक्षित करना चाहते हैं वह धर्म के लिए आवश्यक है। एजी ने कहा कि आप साबित नहीं कर सकते कि हिजाब अनिवार्य धार्मिक प्रथा का हिस्सा है। 

आठवां दिन : इस दिन धार्मिक प्रथाओं और धर्मनिरपेक्षता को लेकर चर्चाएं हुईं। सुनवाई के दौरान अधिवक्ता एसएस नागानंद ने कहा कि आज मुस्लिम छात्राएं धार्मिक प्रथा के नाम पर हिजाब पहनने की जिद कर रही हैं। उन्होंने कहा कि ब्राह्मणों में उपनयन संस्कार के बाद सिला हुआ कपड़ा पहनने की अनुमति नहीं है। इसे आधार बनाकर यदि हिंदू ब्राह्मण लड़के बिना शर्ट स्कूल आने की जिद करेंगे तो क्या होगा। इस तरह के विवादों का अंत कहां है। उन्होंने तर्क दिया कि जब धर्म का हिस्सा होने के नाम पर सुप्रीम कोर्ट ने पटाखे फोड़ने की अनुमति नहीं दी तो फिर हिजाब की अनुमति क्यों दी जानी चाहिए।

नौवां दिन : महाधिवक्ता प्रभुलिंग नवदगी ने सुप्रीम कोर्ट के हवाले से बताया कि मस्जिद भी इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। जस्टिस दीक्षित ने कहा कि हिंदू विवाह में हम मानते हैं कि मंगलसूत्र आवश्यक है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि देश में सभी हिंदुओं को अनिवार्य रूप से मंगलसूत्र पहनना चाहिए। हम कानूनी स्थिति के आधार पर इसे छोड़ देते हैं। महाधिवक्ता नवदगी ने कहा कि इस मामले में (Hijab row) में कठिनाई यही है कि जैसे ही यह एक धार्मिक स्वीकृति बन जाती है, संबंधित महिला उस विशेष पोशाक को पहनने के लिए बाध्य हो जाती है। उसकी पसंद मायने नहीं रखती।

दसवां दिन : वकील एसएस नागानंद ने आरोप लगाया कि कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (CFI)  नामक संगठन ने शिक्षकों को धमकाया। उन्होंने छात्राओं की आधार कार्ड पर लगी तस्वीरें दिखाईं, जिनमें छात्राओं ने हिजाब नहीं पहना था। उन्होंने पूछा- आखिर क्लासरूम में हिजाब की क्या जरूरत आ पड़ी। उन्होंने सीएफआई द्वारा कट्‌टरपंथ फैलाने का आरोप लगाया। नागानंद ने कहा कि दक्षिणपंथी हिंदू लड़के कह रहे हैं कि वे भगवा स्कार्फ पहनेंगे। कल मुसलमान लड़के कहेंगे कि वे टोपी पहनना चाहते हैं। आखिर यह विवाद कहां समाप्त हो रहा है। सड़क पर ढोल पीटने वालों से समाज को खतरा नहीं होना चाहिए।

ग्यारहवां दिन : छात्राओं के वकील डॉ. कुलकर्णी ने कहा स्कूलों और कॉलेजों में हिजाब पर प्रतिबंध लगाने से मुस्लिम लड़कियों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ा है, खासकर हिजाब पहनने वाली लड़कियों पर। हिजाब को 1,400 वर्षों से एक सांस्कृतिक प्रथा और रिवाज के रूप में देखा जाता है। इस पर दूसरे पक्ष के वकील ने कहा कि 21वीं सदी में हम 1400 साल पुरानी प्रथा को चलाएं, यह कैसे संभव हो सकता है। डॉ. कुलकर्णी के सवाल पर जस्टिस दीक्षित ने कहा – हम आपके लिखे हर पैराग्राफ को पढ़ेंगे। इसके बाद कुलकर्णी ने रमजान में हिजाब की अनुमति मांगी, जिस पर चीफ जस्टिस ने कहा– हम सुनवाई के अंतिम चरण में हैं। अंतिम आदेश पारित करेंगे। इसके बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।

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