देहरादून, 22 सितम्बर 2021

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने ‘परिवर्तन यात्रा’ रैली में अपने हालिया बयान से राजनीतिक गलियारों में अटकलों का बाज़ार गर्म कर दिया है. उत्तराखंड में ‘दलित मुख्यमंत्री’ वाले बयान के बाद सबसे पहले तो यही स्पष्ट संकेत आ रहा है कि रावत खुद को ‘मुख्यमंत्री’ पद की दौड़ से बाहर रखना चाह रहे हैं. दूसरी तरफ, उनके इस बयान का सीधा ताल्लुक राज्य में जाति की राजनीति को बढ़ावा देने के तौर पर समझा जा रहा है. यहां यह बात याद रखने की है कि उत्तराखंड की आबादी का करीब 18 फीसदी हिस्सा दलितों की संख्या का है.

रावत ने बीते सोमवार को ‘परिवर्तन यात्रा’ रैली में कहा कि वह उत्तराखंड का मुख्यमंत्री किसी दलित को बनते देखना चाहते हैं. पूर्व मुख्यमंत्री का यह बयान पंजाब कांग्रेस द्वारा एक दलित को राज्य का मुख्यमंत्री चुनकर इतिहास रचने के कुछ दिनों बाद आया. चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम बनाए जाने के बाद पंजाब में कांग्रेस के प्रभारी रावत ने सभा में कहा, “कांग्रेस ने एक ऐसी महिला के बेटे को मुख्यमंत्री बनाकर इतिहास रच दिया, जिसने जीवन भर गोबर के उपले बनाए.” यही नहीं, आगे रावत ने दलितों का कर्ज़ चुकाने की बात कुछ ऐसे कही.

‘दलितों का कर्ज चुका देंगे’ : प्रदेश कांग्रेस चुनाव अभियान समिति के प्रमुख रावत ने कहा, “यह कम महत्वपूर्ण है कि आज दलित मतदाताओं की संख्या क्या है, बल्कि अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने कांग्रेस को सत्ता में बने रहने में कितनी मदद की है. अवसर आने पर हम उनका ‘कर्ज’ चुका देंगे. मैं उन्हें आश्वस्त करना चाहता हूं कि कांग्रेस उनकी उम्मीदों को पूरा करने के लिए आगे बढ़ेगी.” अब सियासी गलियारों में इस बयान का पूरा अर्थ क्या निकल रहा है?

आखिर क्या है मतलब? उत्तराखंड में सबसे बड़े कांग्रेस नेता होने के नाते उनकी टिप्पणी उन लोगों को हैरान करने वाली है, जो 2022 में राज्य में पार्टी की सत्ता में वापसी की स्थिति में रावत को ही सीएम पद की दौड़ में सबसे आगे देख रहे थे. रावत ने कहा, “महाभारत में अभिमन्यु की तरह, मैं जाल में फंस सकता हूं. मैं तभी चुनाव लड़ूंगा, जब आलाकमान मुझसे ऐसा बोलेगा. मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से पार्टी में कोई विवाद हो. मैंने 2002, 2007 और 2012 में भी चुनाव नहीं लड़ा था. इस बार मैं 2002 की तरह ही काम करना चाहता हूं.” भाजपा इस बयान को कैसे देख रही है?

भाजपा ने कहा, ‘विरोधाभास’ : रावत के इस बयान को आड़े हाथों लेते हुए भाजपा ने कहा कि यह उत्तराखंड में जातिगत राजनीति को हवा देने की कोशिश है. रावत के मशविरे को खारिज करते हुए बीजेपी ने कहा कि उनका बयान विरोधाभासी है. कांग्रेस पार्टी सार्वजनिक तौर पर जो शिक्षा देती है, उस पर खुद अमल नहीं करती. भाजपा ने साफ तौर पर इसे वोटरों को रिझाने की सियासत करार दिया.