महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों के नतीजों ने राज्य की सियासत में बड़ा संदेश दे दिया है। नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों में सत्तारूढ़ महायुति ने जोरदार जीत दर्ज की है। इस जीत की सबसे बड़ी हिस्सेदार Bharatiya Janata Party रही, जिसने अकेले दम पर विपक्ष को बड़ा झटका दिया है। वहीं ठाकरे बंधुओं से जुड़ी पार्टियों का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा, जबकि कांग्रेस को सीमित स्तर पर फायदा जरूर मिला है।
महायुति का दम, BJP सबसे बड़ी पार्टी
राज्य की कुल 288 नगर परिषद और नगर पंचायत सीटों में से 217 सीटों पर महायुति ने जीत दर्ज की है।
नगर अध्यक्ष पदों पर बीजेपी ने 129 सीटें जीतकर खुद को राज्य की सबसे मजबूत शहरी पार्टी के रूप में स्थापित कर लिया है।
महायुति के सहयोगी दलों का प्रदर्शन भी असरदार रहा—
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Shiv Sena: 51 नगर अध्यक्ष
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Nationalist Congress Party: 37 नगर अध्यक्ष
ठाकरे बंधुओं की सियासत को झटका
निकाय चुनावों में ठाकरे परिवार से जुड़ी दोनों पार्टियों को करारी हार का सामना करना पड़ा—
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Shiv Sena (UBT): सिर्फ 8 नगर अध्यक्ष
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Maharashtra Navnirman Sena: एक भी सीट नहीं
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भावनात्मक राजनीति, कमजोर संगठन और जमीनी स्तर पर पकड़ ढीली पड़ने के कारण ठाकरे बंधु शहरी वोटरों को साधने में नाकाम रहे।
कांग्रेस को नुकसान कम, फायदा ज्यादा
हालांकि Indian National Congress कोई बड़ी लहर नहीं बना पाई, लेकिन महाविकास आघाड़ी के बाकी दलों की तुलना में उसका प्रदर्शन बेहतर रहा।
कांग्रेस ने 36 नगर अध्यक्ष पद जीतकर यह साफ कर दिया कि कुछ इलाकों में उसका संगठन अभी भी जिंदा है। माना जा रहा है कि ठाकरे गुट की कमजोरी का आंशिक लाभ कांग्रेस को मिला।
पार्षदों में भी BJP का दबदबा
पार्षदों की संख्या में भी बीजेपी सबसे आगे रही—
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बीजेपी: 1900 पार्षद
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शिवसेना (शिंदे): 828 पार्षद
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एनसीपी (अजित पवार): 759 पार्षद
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कांग्रेस: 616 पार्षद
इलाकेवार नतीजे
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विदर्भ: बीजेपी का गढ़ साबित हुआ, 55 नगर अध्यक्ष और 775 पार्षद
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कोंकण-ठाणे: शिंदे गुट की शिवसेना ने मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई
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पश्चिम महाराष्ट्र: अजित पवार गुट का असर साफ दिखा
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मराठवाड़ा: मुकाबला त्रिकोणीय रहा, लेकिन महायुति भारी पड़ी
क्या कहते हैं ये नतीजे?
नगर निकाय चुनावों के नतीजे साफ संकेत दे रहे हैं कि महाराष्ट्र की शहरी राजनीति में फिलहाल बीजेपी का डंका बज रहा है।
ठाकरे बंधुओं के लिए यह चुनाव सियासी चेतावनी है, जबकि कांग्रेस के लिए यह मौका है कि वह इस बढ़त को आगे की राजनीति में भुनाए।
कुल मिलाकर, ये नतीजे आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले विपक्ष के लिए बड़ा अलार्म साबित हुए हैं।




