बांग्लादेश में धर्म और कानून पर सियासी बहस तेज, BNP के बयान से बढ़ी हलचल, तस्लीमा नसरीन का तीखा विरोध

बांग्लादेश में धर्म और कानून पर सियासी बहस तेज, BNP के बयान से बढ़ी हलचल, तस्लीमा नसरीन का तीखा विरोध

बांग्लादेश में एक बार फिर धर्म और कानून को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। विपक्षी दल Bangladesh Nationalist Party (BNP) के महासचिव Mirza Fakhrul Islam Alamgir के एक हालिया बयान ने देश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।

मिर्जा फखरुल ने कहा है कि बांग्लादेश में ऐसा कोई कानून स्वीकार नहीं किया जाएगा, जो कुरान और सुन्नत से बाहर हो। यह बयान ऐसे समय पर सामने आया है, जब देश आगामी राष्ट्रीय चुनावों की ओर बढ़ रहा है और राजनीतिक दल अपने-अपने समर्थक वर्ग को साधने में जुटे हैं।


कुरान और सुन्नत के दायरे में कानून की बात

ठाकुरगांव सदर उपजिला में धार्मिक विद्वानों के साथ एक बैठक के दौरान मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने कहा कि BNP को लेकर यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि पार्टी इस्लामी मूल्यों के खिलाफ है।

उन्होंने दावा किया कि BNP हमेशा से कुरान और सुन्नत के आदर्शों के दायरे में रहकर शासन की बात करती आई है।
BNP महासचिव के अनुसार, “इस्लाम शांति का धर्म है और हम भी शांति चाहते हैं। इस चुनाव के जरिए हम एक शांतिपूर्ण और न्यायपूर्ण बांग्लादेश बनाना चाहते हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि बांग्लादेश की लगभग 90 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है और पार्टी ने हमेशा देश की धार्मिक संस्कृति और मूल्यों की रक्षा की है।


मौजूदा हालात पर सरकार पर गंभीर आरोप

BNP महासचिव ने मौजूदा राजनीतिक और प्रशासनिक स्थिति को लेकर सत्तारूढ़ व्यवस्था पर गंभीर आरोप लगाए।
उनका कहना था कि पिछले करीब 15 वर्षों में—

  • लोकतांत्रिक संस्थानों को कमजोर किया गया

  • अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा

  • बैंकिंग व्यवस्था में अनियमितताएं हुईं

  • बड़ी मात्रा में धन विदेशों में भेजा गया

BNP का आरोप है कि सत्ता में बने रहने के लिए ऐसे कानून बनाए गए, जिनसे आम नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित हो गई।


चुनाव, दमन और खालिदा जिया का जिक्र

मिर्जा फखरुल ने यह भी दावा किया कि हाल के वर्षों में उलेमा, बुद्धिजीवियों और विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया और उन्हें प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। कुछ मामलों में मौत की सजा दिए जाने के भी आरोप लगाए गए।

उन्होंने 2024 के जन आंदोलन का हवाला देते हुए कहा कि उस दौरान करीब दो हजार छात्रों की गोली लगने से मौत हुई और ढाका सहित कई इलाकों में व्यापक हिंसा देखी गई। BNP के अनुसार, इन घटनाओं ने देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और नागरिक स्वतंत्रताओं पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

इस संदर्भ में उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री Khaleda Zia का भी उल्लेख किया। BNP का दावा है कि खालिदा जिया को कथित तौर पर झूठे मामलों में छह वर्षों तक जेल में रखा गया और इस दौरान उन्हें समुचित चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिल सकीं।


तस्लीमा नसरीन की तीखी प्रतिक्रिया

BNP के इस रुख पर लेखिका और मानवाधिकार कार्यकर्ता Taslima Nasreen ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है।
उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि BNP “मुस्लिम पहचान को आगे रखकर जमात-ए-इस्लामी से भी आगे जाने की कोशिश कर रही है।”

तस्लीमा नसरीन के अनुसार, अगर कुरान और हदीस पर आधारित कानून लागू किए गए तो—

  • महिलाओं के अधिकार सबसे पहले प्रभावित होंगे

  • गैर-मुसलमानों की स्थिति कमजोर होगी

  • अल्पसंख्यकों और प्रगतिशील विचारों की आवाज दबाई जाएगी


‘धार्मिक कानून आधुनिक सभ्यता के खिलाफ’

तस्लीमा नसरीन ने कहा कि किसी भी आधुनिक और सभ्य देश में कानून नागरिक अधिकारों और समानता के सिद्धांतों पर आधारित होते हैं, न कि धार्मिक ग्रंथों पर।
उनके मुताबिक, धार्मिक कानून—

  • मानवाधिकारों के खिलाफ

  • महिलाओं के खिलाफ

  • समानता और स्वतंत्रता के विरुद्ध

  • विज्ञान और आधुनिक सोच के विरोधी

होते हैं और समाज में नफरत, हिंसा और भेदभाव को बढ़ावा देते हैं।


क्यों अहम है यह बहस?

विशेषज्ञों के अनुसार, यह बहस केवल बांग्लादेश के कानून तक सीमित नहीं है। यह देश की लोकतांत्रिक दिशा, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकारों तथा चुनावी राजनीति में धर्म की भूमिका से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुकी है।

चुनाव से पहले BNP का यह बयान और उस पर तस्लीमा नसरीन की प्रतिक्रिया आने वाले दिनों में बांग्लादेश की राजनीति को और गर्मा सकती है।

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