प्रयागराज में आयोजित माघ मेले के दौरान हुआ एक विवाद इन दिनों देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। यह मामला केवल मेला प्रशासन और संत समाज के बीच टकराव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने सदियों पुरानी शंकराचार्य परंपरा को भी राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर देश में शंकराचार्य सिर्फ चार ही क्यों होते हैं? क्या कोई भी स्वयं को शंकराचार्य घोषित कर सकता है? और इस पद की वैधता तय करने के नियम क्या हैं?
माघ मेले का विवाद और उठते सवाल
माघ मेले के दौरान ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों और मेला प्रशासन के बीच टकराव देखने को मिला था। यह विवाद धीरे-धीरे राजनीतिक और धार्मिक बहस में बदल गया। इसी के साथ यह सवाल भी जोर पकड़ने लगा कि देश में शंकराचार्य कितने हो सकते हैं और उनकी मान्यता का आधार क्या है।
शंकराचार्य परंपरा की शुरुआत
शंकराचार्य की पदवी का इतिहास सीधे आठवीं शताब्दी के महान दार्शनिक और संत आदि शंकराचार्य से जुड़ा है। उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण कर सनातन धर्म के अद्वैत वेदांत सिद्धांत का प्रचार किया। उनका मूल दर्शन था—ब्रह्म एक है और वही संपूर्ण सृष्टि का आधार है। इस दर्शन को स्थायी और संगठित रूप देने के लिए आदि शंकराचार्य ने एक मजबूत संस्थागत व्यवस्था की नींव रखी।
चार दिशाओं में चार मठों की स्थापना
आदि शंकराचार्य ने भारत की चारों दिशाओं में चार प्रमुख मठों की स्थापना की। इसका उद्देश्य यह था कि अद्वैत वेदांत की शिक्षा देश के हर कोने तक पहुंचे। वैदिक सिद्धांत “एकोहं बहुस्याम” यानी एक से अनेक होने की भावना के आधार पर चार मठों की व्यवस्था बनाई गई। इन्हीं चार मठों के पीठाधीश्वर को शंकराचार्य की उपाधि दी जाती है।
शंकराचार्य बनने के नियम कौन तय करता है?
शंकराचार्य की नियुक्ति कोई मनमानी या व्यक्तिगत निर्णय नहीं होती। इसके लिए आदि शंकराचार्य द्वारा रचित ग्रंथ ‘मठाम्नाय महानुशासन’ को आधार माना जाता है। इस ग्रंथ में मठों की व्यवस्था, उत्तराधिकार, आचार-विचार और शंकराचार्य चयन की प्रक्रिया से जुड़े नियम स्पष्ट रूप से वर्णित हैं। जो मठ इस व्यवस्था के अंतर्गत नहीं आते, उन्हें आधिकारिक धार्मिक मान्यता नहीं मिलती।
देश के चार मान्य शंकराचार्य मठ
देश में वर्तमान में चार शंकराचार्य पीठ ही धार्मिक परंपरा के अनुसार मान्य माने जाते हैं—
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उत्तराम्नाय मठ (ज्योतिर्मठ) – उत्तराखंड के जोशीमठ में बदरिकाश्रम के पास स्थित, इसी पीठ को लेकर मौजूदा विवाद चर्चा में है।
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पूर्वाम्नाय मठ (गोवर्धन मठ) – ओडिशा के पुरी में स्थित, जिसके शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती हैं।
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दक्षिणाम्नाय मठ (शृंगेरी मठ या शारदा पीठ) – कर्नाटक के शृंगेरी में स्थित, यहां शंकराचार्य स्वामी भारती तीर्थ हैं।
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पश्चिमाम्नाय मठ (द्वारिका पीठ) – गुजरात के द्वारिका में स्थित, जहां वर्तमान में स्वामी सदानंद शंकराचार्य हैं।
चार से अधिक शंकराचार्य क्यों मान्य नहीं?
वैदिक और सनातन परंपरा के अनुसार केवल इन्हीं चार मठों के पीठाधीश्वर शंकराचार्य कहलाते हैं। देश में अन्य कई मठों में भी शंकराचार्य की उपाधि का प्रयोग किया जाता है, लेकिन वे ‘मठाम्नाय महानुशासन’ के दायरे में नहीं आते। इसी कारण उन्हें धार्मिक परंपरा में आधिकारिक मान्यता और व्यापक विश्वसनीयता प्राप्त नहीं होती, भले ही उनके अनुयायी और आस्था रखने वाले लोग मौजूद हों।
शंकराचार्य की पदवी आस्था से अधिक परंपरा, शास्त्र और नियमों से जुड़ी हुई है। यही कारण है कि सदियों से चली आ रही व्यवस्था के तहत देश में केवल चार शंकराचार्य ही मान्य माने जाते हैं। मौजूदा विवाद ने एक बार फिर इस ऐतिहासिक परंपरा को समझने और जानने का अवसर दिया है।




