प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज गुजरात के पवित्र सोमनाथ मंदिर में आयोजित शौर्य यात्रा में भाग लिया। यह यात्रा उन वीर योद्धाओं की स्मृति में निकाली गई, जिन्होंने सदियों पहले सोमनाथ की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। इस आयोजन ने एक बार फिर उस ऐतिहासिक प्रश्न को चर्चा में ला दिया है—सोमनाथ मंदिर से आखिर कितनी संपत्ति लूटी गई थी और आज उसकी अनुमानित कीमत क्या हो सकती है?
सोमनाथ मंदिर: आस्था और समृद्धि का प्रतीक
भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक सोमनाथ मंदिर प्राचीन भारत के सबसे समृद्ध धार्मिक केंद्रों में गिना जाता था। अरब सागर के तट पर स्थित यह मंदिर न सिर्फ आस्था का केंद्र था, बल्कि उस दौर की स्थापत्य कला, सांस्कृतिक वैभव और आर्थिक शक्ति का भी प्रतीक माना जाता था।
महमूद गजनवी का आक्रमण
वर्ष 1025–1026 ईस्वी में महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर हमला किया। फारसी और भारतीय इतिहास ग्रंथों में इस हमले को भीषण विनाश और व्यापक लूट से जोड़ा गया है। बताया जाता है कि मंदिर को तोड़ा गया और वहां जमा अपार संपत्ति को लूट लिया गया।
कितना सोना लूटा गया था?
इतिहासकारों के अनुसार, गजनवी सोमनाथ से लगभग 20 मिलियन सोने के दीनार अपने साथ ले गया था। कुछ ऐतिहासिक विवरणों में यह आंकड़ा बढ़ाकर 100 मिलियन दीनार तक बताया गया है। आधुनिक शोधकर्ताओं का अनुमान है कि केवल मंदिर के खजाने से ही करीब 6 टन सोना लूटा गया था। इसमें चांदी, रत्न, आभूषण और अन्य कीमती वस्तुएं शामिल नहीं हैं।
सोने के अलावा क्या-क्या गया?
लूट सिर्फ सोने तक सीमित नहीं थी। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार,
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बहुमूल्य रत्नों से सजे 56 विशाल स्तंभ,
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पूजा में प्रयुक्त हजारों सोने और चांदी की मूर्तियां,
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मंदिर की घंटियों से जुड़ी लगभग 6,765 किलोग्राम वजनी सोने की चेन,
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और चंदन की लकड़ी से बना मुख्य द्वार भी गजनवी अपने साथ ले गया था।
इन वस्तुओं को उस समय की अपूरणीय सांस्कृतिक धरोहर माना जाता था।
आज उस सोने की कीमत कितनी होगी?
आज के समय में यदि सोने की कीमत लगभग ₹1,40,000 प्रति 10 ग्राम मानी जाए, तो 6,000 किलोग्राम सोने की अनुमानित कीमत करीब ₹84,270 करोड़ बैठती है। वहीं 20 मिलियन सोने के दीनार की मौजूदा क्रयशक्ति के आधार पर कीमत अरबों डॉलर में आंकी जाती है।
लूट से आगे की कहानी
इतिहासकार मानते हैं कि सोमनाथ की लूट केवल आर्थिक नुकसान नहीं थी, बल्कि यह एक बड़े सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र के विनाश का प्रतीक भी थी। इसके बावजूद, भारत ने बार-बार सोमनाथ का पुनर्निर्माण किया, जो यह दर्शाता है कि आस्था और स्वाभिमान को कभी पूरी तरह मिटाया नहीं जा सकता।
सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का आयोजन इसी ऐतिहासिक आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे होने के अवसर पर किया गया है, जो न केवल अतीत की पीड़ा को याद करता है, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण और आत्मसम्मान का संदेश भी देता है।




