द फ्रंट डेस्क : पश्चिम एशिया में ईरान-इजरायल टकराव के दोबारा भड़कने से वैश्विक ऊर्जा बाजार और समुद्री व्यापार मार्गों में अनिश्चितता बढ़ गई है। यदि हालात और बिगड़ते हैं खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर क्षेत्र में तो इसका सीधा असर भारत जैसी ऊर्जा-आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। ऐसे में जरूरी है कि पूरे परिदृश्य को विस्तार से समझा जाए भारत के लिए जोखिम क्या हैं, किसे फायदा हो सकता है और नीति-स्तर पर क्या विकल्प मौजूद हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य: सबसे बड़ा ऊर्जा “चोक-पॉइंट”
होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और आगे अरब सागर से जोड़ने वाला बेहद अहम और संकरा समुद्री मार्ग है। वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक-चौथाई हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है, जबकि तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की बड़ी मात्रा भी यहीं से निर्यात होती है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, इराक और ईरान जैसे प्रमुख उत्पादक देश अपनी ऊर्जा आपूर्ति के लिए इसी मार्ग पर निर्भर हैं। यदि इस मार्ग में किसी भी प्रकार का व्यवधान आता है चाहे सैन्य तनाव के कारण अस्थायी अवरोध, बीमा प्रीमियम में भारी वृद्धि या जहाजों की आवाजाही में देरी तो कच्चे तेल और गैस की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है। विश्लेषकों का अनुमान है कि गंभीर संकट की स्थिति में तेल 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकता है, जबकि चरम परिस्थितियों में यह और भी अधिक स्तर पर पहुंच सकता है। इसका असर सिर्फ ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दिखाई देगा।
भारत पर सीधा प्रभाव: आयात बिल, महंगाई और रुपया
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है और अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। भारत के कच्चे तेल आयात का एक महत्वपूर्ण भाग होर्मुज मार्ग से होकर आता है, जबकि एलएनजी आपूर्ति में भी खाड़ी देशों की प्रमुख भूमिका है। ऐसे में यदि तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ सकता है। तेल के दाम में हर 1 डॉलर की वृद्धि से भारत के सालाना आयात खर्च में अरबों डॉलर की बढ़ोतरी हो सकती है। इसका सीधा असर चालू खाते के घाटे पर पड़ेगा। जब आयात बिल बढ़ता है, तो रुपये पर दबाव आता है और मुद्रा कमजोर हो सकती है। कमजोर रुपया आयात को और महंगा बना देता है, जिससे आर्थिक दबाव का चक्र तेज हो जाता है। इसके अलावा ईंधन महंगा होने से परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ती है। इसका असर रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है और मुद्रास्फीति बढ़ सकती है। उद्योगों और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की लागत बढ़ने से विकास दर पर भी असर पड़ सकता है। यानी ऊर्जा संकट का प्रभाव केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि व्यापक आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।
लाल सागर और बाब-अल-मंदब: व्यापार की दूसरी धमनियाँ
होर्मुज के अलावा लाल सागर और बाब-अल-मंदब जलडमरूमध्य भी वैश्विक व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। स्वेज नहर के जरिए एशिया और यूरोप के बीच कंटेनर शिपिंग का बड़ा हिस्सा गुजरता है। यदि इस क्षेत्र में हमले या असुरक्षा की घटनाएं बढ़ती हैं, तो जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी सिरे केप ऑफ गुड होप से लंबा रास्ता अपनाना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में शिपिंग लागत में तेज उछाल आएगा और डिलीवरी में देरी होगी। भारतीय निर्यातकों के लिए यह प्रतिस्पर्धा में कमी का कारण बन सकता है, क्योंकि परिवहन महंगा होने से उत्पादों की अंतिम कीमत बढ़ जाएगी। आयातित सामान भी महंगे होंगे, जिससे घरेलू बाजार पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान का असर भारत के व्यापार और विनिर्माण क्षेत्र पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है।
किसे मिल सकता है फायदा?
ऊंची ऊर्जा कीमतों से ऊर्जा निर्यातक देशों और तेल-गैस कंपनियों को अल्पकालिक लाभ मिल सकता है। जो देश ऊर्जा उत्पादन में आत्मनिर्भर हैं और अतिरिक्त उत्पादन का निर्यात करते हैं, वे ऊंचे दाम का फायदा उठा सकते हैं। बीमा कंपनियों और रक्षा उद्योग को भी बढ़ती अस्थिरता के बीच लाभ हो सकता है, क्योंकि समुद्री बीमा प्रीमियम और रक्षा व्यय में वृद्धि की संभावना रहती है। हालांकि यह लाभ स्थायी नहीं होता। लंबे समय तक ऊंची ऊर्जा कीमतें वैश्विक मांग को कमजोर कर सकती हैं, जिससे आर्थिक गतिविधि धीमी पड़ती है और अंततः निर्यातकों पर भी असर पड़ता है।
भारत के लिए नीतिगत विकल्प
इस चुनौतीपूर्ण परिदृश्य में भारत के पास कुछ महत्वपूर्ण नीतिगत विकल्प मौजूद हैं। रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का उपयोग आपातकालीन स्थिति में राहत दे सकता है। आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाकर जोखिम को कम किया जा सकता है। दीर्घकालिक अनुबंध और मूल्य-जोखिम प्रबंधन की रणनीतियां आयात लागत में अचानक उछाल से बचाने में मदद कर सकती हैं।इसके साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा, घरेलू गैस उत्पादन और ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देना दीर्घकालिक समाधान की दिशा में अहम कदम हो सकते हैं। ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ना ही भविष्य में ऐसे झटकों से बचाव का स्थायी उपाय है।
यदि ईरान-इजरायल संघर्ष का विस्तार होर्मुज और लाल सागर मार्गों में गंभीर व्यवधान पैदा करता है, तो भारत को ऊर्जा आयात, महंगाई, व्यापार लागत और रुपये पर दबाव के रूप में बहु-स्तरीय झटका लग सकता है। वहीं ऊर्जा निर्यातक देशों और तेल कंपनियों को अल्पकालिक लाभ मिल सकता है। आने वाले सप्ताह यह तय करेंगे कि यह तनाव सीमित रहता है या वैश्विक ऊर्जा बाजार को लंबे समय तक अस्थिर करता है। भारत के लिए चुनौती स्पष्ट है आपूर्ति सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए आर्थिक स्थिरता बनाए रखना और दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति को और मजबूत करना।




