इन दिनों दुनिया की राजनीति में एक शब्द बार-बार सुनाई दे रहा है— डीप स्टेट। सरकारें गिरने से लेकर युद्ध शुरू और खत्म होने तक, कई बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के पीछे इसी अदृश्य ताक़त का ज़िक्र किया जा रहा है। हालिया उदाहरण वेनेजुएला है, जहां अमेरिका के हस्तक्षेप को डीप स्टेट की भूमिका से जोड़कर देखा जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या डीप स्टेट सिर्फ एक साजिशी थ्योरी है या फिर वाकई लोकतांत्रिक सरकारों से भी ज़्यादा ताक़तवर कोई समानांतर सत्ता मौजूद है?
डीप स्टेट आखिर है क्या?
रिसर्च डेटाबेस EBSCO के मुताबिक, डीप स्टेट एक ऐसा गुप्त नेटवर्क होता है, जिसमें सरकारी अधिकारी, खुफिया एजेंसियों के लोग, कॉरपोरेट हित, सैन्य तंत्र और कभी-कभी गैर-सरकारी संगठन भी शामिल होते हैं। ये लोग चुनी हुई सरकारों से अलग रहकर काम करते हैं और नीतियों, सत्ता संतुलन और अंतरराष्ट्रीय फैसलों पर असर डालते हैं।
अमेरिका में डीप स्टेट का ज़िक्र अक्सर CIA, FBI और NSA जैसी एजेंसियों से जोड़ा जाता है। आलोचकों का मानना है कि ये नेटवर्क लोकतांत्रिक जवाबदेही से बाहर रहकर अपने हित साधते हैं और कई बार सरकारों को भी कमजोर कर देते हैं।
डीप स्टेट की शुरुआत कहां से मानी जाती है?
‘डीप स्टेट’ शब्द की जड़ें तुर्किये में मिलती हैं, जहां 1990 के दशक में एक सड़क हादसे ने सरकार, पुलिस और माफिया के गठजोड़ को उजागर किया। इसे वहां “डरिन देवेलेट” यानी गहरा राज्य कहा गया।
अमेरिका में इसकी जड़ें दूसरे विश्व युद्ध तक जाती हैं। 1941 में पर्ल हार्बर हमले के बाद अमेरिका ने Office of Strategic Services (OSS) बनाई, जिसे गुप्त अभियानों और जासूसी की खुली छूट दी गई। युद्ध खत्म होने के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति Harry Truman ने OSS को यह कहते हुए बंद कर दिया कि यह अमेरिकी लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकती है।
लेकिन शीत युद्ध के दौरान 1947 में CIA का गठन हुआ, जिसने OSS की भूमिका को आगे बढ़ाया।
शीत युद्ध और सरकारें गिराने का इतिहास
कोल्ड वॉर के दौर में CIA पर कई देशों में सत्ता परिवर्तन कराने के आरोप लगे।
इतिहास के कुछ बड़े उदाहरण:
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1953: ईरान में ऑपरेशन अजाक्स
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1954: ग्वाटेमाला
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1960: कांगो
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1973: चिली
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1981: इक्वाडोर
इन सभी मामलों में दावा किया गया कि अमेरिकी हितों की रक्षा के नाम पर चुनी हुई सरकारों को गिराया गया। यही घटनाएं डीप स्टेट की थ्योरी को मज़बूती देती हैं।
क्या डीप स्टेट अमेरिका के लिए भी खतरा है?
अमेरिका में ही कई लोग मानते हैं कि डीप स्टेट लोकतंत्र के लिए खतरा है।
1962 के क्यूबन मिसाइल संकट के दौरान राष्ट्रपति John F. Kennedy ने सैन्य हमला करने के बजाय नाकाबंदी का फैसला लिया, जिसे डीप स्टेट से टकराव के रूप में देखा गया।
1945 से 1975 के बीच CIA का Project SHAMROCK सामने आया, जिसमें अपने ही नागरिकों की निगरानी की गई। आलोचकों का कहना है कि डीप स्टेट के पास इतनी गोपनीय जानकारी होती है कि वह सांसदों और नेताओं पर दबाव बना सकता है।
डोनाल्ड ट्रंप और डीप स्टेट
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump लगातार डीप स्टेट को अमेरिका के लिए खतरा बताते रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह नेटवर्क सरकार के फैसलों को अंदर से कमजोर करता है।
ट्रंप की विदेश नीति में मोनरो डॉक्ट्रिन का जिक्र रहा, जिसके तहत अमेरिका लैटिन अमेरिका में दखल को जायज़ ठहराता है। ट्रंप समर्थकों का मानना है कि उनके खिलाफ भी डीप स्टेट ने साजिशें रचीं।
वेनेजुएला: डीप स्टेट का ताज़ा उदाहरण?
वेनेजुएला में राष्ट्रपति Nicolás Maduro की सरकार गिरने और अमेरिकी दखल को डीप स्टेट की रणनीति से जोड़ा जा रहा है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने यहां “डी-लेजिटिमाइजेशन” रणनीति अपनाई—यानी सरकार को अवैध बताकर हस्तक्षेप।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह अमेरिका की रणनीतिक जीत नहीं, बल्कि लंबी अवधि में हार भी साबित हो सकती है।
नेपाल और बांग्लादेश में डीप स्टेट की बहस
नेपाल में 2025 के Gen-Z प्रदर्शन—भ्रष्टाचार, सोशल मीडिया बैन और राजशाही बहाली जैसे मुद्दों पर हुए। कुछ लोग इसे अमेरिकी या चीनी डीप स्टेट से जोड़ते हैं।
अमेरिका USAID और MCC, जबकि चीन BRI परियोजनाओं के जरिए प्रभाव बढ़ाता है।
बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के पतन को भी डीप स्टेट से जोड़ा गया, हालांकि ठोस सबूत नहीं मिले। कई एक्सपर्ट्स इसे घरेलू असंतोष और आर्थिक कारणों का नतीजा मानते हैं।
भारत में डीप स्टेट को लेकर क्या कहा गया?
भारत में भी यह बहस उठ चुकी है। 2024 में तत्कालीन उपराष्ट्रपति Jagdeep Dhankhar ने कहा था कि भारत जैसे लोकतंत्र को डीप स्टेट के हाथों कमजोर नहीं होने दिया जा सकता।
बीजेपी सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने जॉर्ज सोरोस की Open Society Foundation पर भारत में अस्थिरता फैलाने के आरोप लगाए। किसान आंदोलन, विदेशी NGOs और चुनावों में दखल जैसे मुद्दों पर डीप स्टेट का ज़िक्र हुआ, हालांकि पुख्ता सबूत सामने नहीं आए।
क्या भारत को सतर्क रहने की ज़रूरत है?
रक्षा विशेषज्ञ और रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल संजय कुलकर्णी के मुताबिक, वेनेजुएला की घटना दिखाती है कि बड़ी शक्तियां छोटे और मध्यम देशों में दखल दे सकती हैं।
नेपाल और बांग्लादेश की अस्थिरता भारत की सुरक्षा को प्रभावित करती है। चीन और अमेरिका दोनों अपने-अपने तरीकों से प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करते हैं।
हालांकि भारत अब 4.18 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था है और क्षेत्रीय ताक़त भी, लेकिन पड़ोस में अस्थिरता चुनौतियां बढ़ा सकती है।
डीप स्टेट: साजिश या सच्चाई?
कई विशेषज्ञ डीप स्टेट को कॉन्सपिरेसी थ्योरी मानते हैं, क्योंकि हर असफलता का दोष किसी अदृश्य ताक़त पर डालना आसान होता है।
लेकिन ईरान, चिली और ग्वाटेमाला जैसे ऐतिहासिक उदाहरण इस थ्योरी को पूरी तरह खारिज भी नहीं होने देते।
डीप स्टेट कोई एक संस्था नहीं, बल्कि सत्ता, खुफिया तंत्र और हितों का जटिल जाल है। भारत जैसे देशों के लिए ज़रूरी है कि वे सतर्क रहें, लेकिन बिना ठोस सबूत के हर घटना को साजिश कहना भी खतरनाक हो सकता है। लोकतंत्र की मज़बूती पारदर्शिता और संस्थाओं की जवाबदेही में ही है।




