देहरादून के हरियावाला-धौलास क्षेत्र में वर्ष 2004 में शैक्षिक संस्था स्थापित करने के उद्देश्य से आवंटित भूमि का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देशों के बाद जिला प्रशासन ने संबंधित भूमि की पैमाइश और दस्तावेजों की विस्तृत जांच शुरू कर दी है। प्रशासनिक टीम ने मौके पर पहुंचकर जमीन की मौजूदा स्थिति का आकलन किया और राजस्व अभिलेखों से मिलान की प्रक्रिया प्रारंभ की।
2004 का आवंटन और शर्तें
आधिकारिक जानकारी के अनुसार यह भूमि वर्ष 2004 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. डी. तिवारी के कार्यकाल के दौरान डॉ. महमूद असद मदनी के ट्रस्ट को आवंटित की गई थी। आवंटन का उद्देश्य एक शैक्षणिक संस्थान की स्थापना बताया गया था। सामान्यतः ऐसे आवंटनों में स्पष्ट शर्तें होती हैं। निर्धारित समयसीमा में संस्थान की स्थापना, भूमि उपयोग में परिवर्तन के लिए पूर्व अनुमति, और व्यावसायिक गतिविधियों पर रोक।
अब शिकायतें यह हैं कि निर्धारित उद्देश्य के अनुरूप शैक्षणिक गतिविधियां शुरू नहीं हुईं और जमीन के उपयोग में बदलाव हुआ। आरोपों के अनुसार, कथित तौर पर भूमि पर प्लॉटिंग की गई और व्यावसायिक उपयोग की दिशा में कदम उठाए गए। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही होगी।
पैमाइश क्यों और कैसे?
जिला प्रशासन का कहना है कि पैमाइश का उद्देश्य जमीन की वास्तविक सीमा, कब्जे की स्थिति और उपयोग के स्वरूप का सत्यापन करना है। राजस्व विभाग, सर्वे टीम और स्थानीय प्रशासन की संयुक्त टीम ने स्थल निरीक्षण कर भू-सीमा का मिलान रिकॉर्ड से शुरू किया है। एडीएम के.के. मिश्रा के अनुसार, “आवंटन की मूल शर्तों, भूमि उपयोग में संभावित परिवर्तन और वर्तमान स्थिति की विधिक समीक्षा की जा रही है। यदि शर्तों का उल्लंघन पाया गया तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।” प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि जांच निष्पक्ष और दस्तावेज-आधारित होगी।
स्थानीय दावे और प्रशासन का रुख
स्थानीय स्तर पर यह भी दावा किया जा रहा है कि भूमि के कुछ हिस्से राज्य से बाहर के लोगों को बेचे गए हैं। हालांकि प्रशासन ने कहा है कि ऐसे दावों की पुष्टि दस्तावेजी जांच के बाद ही की जा सकती है। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले रजिस्ट्री, नामांतरण, नक्शा-खसरा और भूमि उपयोग से संबंधित अभिलेखों का परीक्षण किया जाएगा।
कानूनी स्थिति: क्या हो सकती है कार्रवाई?
यदि जांच में यह पाया जाता है कि आवंटन की शर्तों का उल्लंघन हुआ है। जैसे कि शैक्षणिक उद्देश्य के स्थान पर व्यावसायिक उपयोग—तो सरकार के पास कई विकल्प हो सकते हैं। इनमें आवंटन निरस्त करना, भूमि पुनः अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करना, दंडात्मक कार्रवाई या जुर्माना शामिल हो सकते हैं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में मूल लीज डीड और सरकारी आदेश की शर्तें निर्णायक होती हैं। यदि शर्तें स्पष्ट थीं और उनका पालन नहीं हुआ, तो सरकार कार्रवाई के लिए सक्षम है।
बड़ा सवाल: पारदर्शिता और भूमि प्रबंधन
राजधानी देहरादून में तेज़ी से फैलते शहरी विस्तार के बीच भूमि उपयोग और नियोजन से जुड़े मुद्दे पहले भी बहस का विषय रहे हैं। यह प्रकरण एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा करता है कि सार्वजनिक उद्देश्य से आवंटित जमीन का उपयोग निर्धारित शर्तों के अनुरूप हो रहा है या नहीं। मुख्यमंत्री के निर्देशों के बाद शुरू हुई कार्रवाई को प्रशासन की सख्त और जवाबदेह कार्यशैली के रूप में देखा जा रहा है। सरकार ने स्पष्ट संकेत दिया है कि यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो तथ्यों और जांच रिपोर्ट के आधार पर उचित कदम उठाए जाएंगे। फिलहाल पैमाइश और दस्तावेजों की जांच प्रक्रिया जारी है। आने वाले दिनों में रिपोर्ट सामने आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी कि मामला केवल तकनीकी त्रुटि तक सीमित है या फिर व्यापक कार्रवाई की आवश्यकता है।




