यूपी विधानसभा में आई झड़प की नौबत, संजय निषाद ने नेता प्रतिपक्ष को SC-ST एक्ट में मुकदमे की क्यों दी चेतावनी ?

उत्तर प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र 2026 के दौरान बुधवार शाम सदन में अभूतपूर्व हंगामा देखने को मिला। बजट पर चर्चा के बीच सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस इतनी बढ़ गई कि स्थिति हाथापाई तक पहुंच गई। घटनाक्रम ने न सिर्फ सदन की कार्यवाही को प्रभावित किया, बल्कि प्रदेश की राजनीति में भी नया विवाद खड़ा कर दिया।

विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब मत्स्य विभाग के मंत्री और निषाद पार्टी के प्रमुख संजय निषाद बजट पर अपनी बात रख रहे थे। उन्होंने पहले राज्य सरकार के बजट की सराहना की और इसे गरीब, पिछड़े और वंचित वर्गों के हित में बताया। लेकिन इसके बाद उन्होंने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर तीखा हमला बोल दिया, जिससे विपक्षी सदस्य भड़क उठे।

मंत्री का हमला और सदन में टकराव

डॉ. संजय निषाद ने अपने संबोधन में कहा कि निषाद समाज ने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी, मुगलों से संघर्ष किया और पिछले 75 वर्षों से कांग्रेस जैसे दलों के खिलाफ भी लड़ाई लड़ रहा है। उन्होंने सपा की ओर इशारा करते हुए आरोप लगाया कि 30 वर्षों की सत्ता में मछुआ समाज के लिए “एक रुपया तक” खर्च नहीं किया गया। उन्होंने दावा किया कि केंद्र सरकार ने 67 साल में पूरे देश में लगभग 3000 करोड़ रुपये दिए, लेकिन उत्तर प्रदेश में पूर्ववर्ती सरकारों ने मछुआ समुदाय की अनदेखी की। उन्होंने विभागीय नियुक्तियों को लेकर भी सवाल उठाए और कहा कि समाज के साथ भेदभाव हुआ।

मंत्री के तीखे हमलों के बीच सपा विधायक लगातार टोकाटाकी करते रहे। विरोध बढ़ने पर सपा सदस्य वेल में पहुंच गए और नारेबाजी करने लगे। इसी दौरान कुछ विधायकों ने मंत्री के हाथ से कागज छीन लिया। इसे लेकर निषाद पार्टी के विधायक आक्रोशित हो गए और दोनों पक्षों के बीच धक्का-मुक्की की स्थिति बन गई। संसदीय कार्य राज्यमंत्री मयंकेश्वर शरण सिंह ने इसे मंत्री पर हमले की कोशिश बताया और पीठ से हस्तक्षेप की मांग की।

SC-ST एक्ट की चेतावनी और सामाजिक न्याय का मुद्दा

विवाद और तब बढ़ गया जब मंत्री ने नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय के कथित बयान का जिक्र करते हुए कहा कि यदि जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल हुआ है तो माफी मांगी जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि माफी नहीं मांगने पर एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कराया जाएगा। इस बयान के बाद सपा विधायक और आक्रामक हो गए। विपक्ष ने इसे धमकी और राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश बताया।

डॉ. निषाद ने सामाजिक न्याय रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि पिछड़ों के 27 प्रतिशत आरक्षण का बड़ा हिस्सा एक खास वर्ग को मिला और अन्य वर्गों की अनदेखी की गई। उन्होंने कहा कि निषाद, केवट, मल्लाह और बिंद समाज को वर्षों तक हाशिए पर रखा गया। उनके इन आरोपों ने विपक्ष को और भड़का दिया और सदन में शोर-शराबा बढ़ता गया।

स्पीकर के हस्तक्षेप से थमा हंगामा

स्थिति को नियंत्रण से बाहर जाता देख विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना को हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने दोनों पक्षों को शांत रहने और सदन की गरिमा बनाए रखने की अपील की। काफी देर तक चले हंगामे के बाद कार्यवाही सामान्य हुई, लेकिन बजट सत्र के दौरान हुई इस घटना ने साफ कर दिया कि आने वाले चुनावी माहौल में विधानसभा के भीतर राजनीतिक टकराव और तीखा हो सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम को केवल सदन की नोकझोंक के रूप में नहीं देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि निषाद समाज और अन्य पिछड़े वर्गों के मुद्दों को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच रणनीतिक लड़ाई तेज हो गई है। जहां सत्तापक्ष इसे सामाजिक न्याय और उपेक्षित वर्गों की आवाज उठाने का मामला बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे सदन में भड़काऊ राजनीति करार दे रहा है। फिलहाल, बजट सत्र की यह घटना प्रदेश की राजनीति में नई बहस का कारण बन गई है और आने वाले दिनों में इसके राजनीतिक असर देखने को मिल सकते हैं।

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