महाकुंभ भगदड़ मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायिक आयोग की जांच का दायरा बढ़ाने पर दिया जोर, जनहित याचिका निस्तारित

महाकुंभ भगदड़ मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायिक आयोग की जांच का दायरा बढ़ाने पर दिया जोर, जनहित याचिका निस्तारित

प्रयागराज, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महाकुंभ 2025 में मौनी अमावस्या स्नान के दौरान हुई भगदड़ की जांच को लेकर दाखिल जनहित याचिका का निस्तारण कर दिया है। कोर्ट ने सरकार के इस आश्वासन के बाद याचिका का निस्तारण किया कि न्यायिक आयोग अब भगदड़ में हुई मौतों और लापता लोगों की पहचान भी करेगा।

क्या है पूरा मामला?
29 जनवरी को प्रयागराज में महाकुंभ के दौरान मौनी अमावस्या स्नान के समय भगदड़ मच गई थी, जिसमें कई लोगों की मौत हो गई और कई लापता हो गए। इस घटना के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व महासचिव सुरेश चंद्र पांडेय ने जनहित याचिका दायर कर न्यायिक निगरानी समिति गठित करने और मृतकों व लापता लोगों की पहचान सुनिश्चित करने की मांग की थी।

हाईकोर्ट की सुनवाई और राज्य सरकार का पक्ष
चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से पूछा था कि क्या न्यायिक आयोग की जांच का दायरा बढ़ाया जा सकता है। राज्य सरकार के अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने कहा कि गठित आयोग भगदड़ के सभी पहलुओं की जांच करने के लिए सक्षम है। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि आयोग की प्रारंभिक जांच में हताहतों और लापता लोगों की पहचान शामिल नहीं थी।

याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिका के अधिवक्ता सौरभ पांडेय ने तर्क दिया कि सरकार द्वारा बताई गई मृतकों की संख्या संदेहास्पद है। उन्होंने विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और मानवाधिकार संगठनों के बयान का हवाला देते हुए कहा कि मृतकों के परिजनों को मृत्यु प्रमाण पत्र प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। कुछ परिवारों को बिना पोस्टमार्टम 15,000 रुपये देकर प्रमाण पत्र देने का आश्वासन दिया गया, लेकिन उन्हें दस्तावेज़ प्राप्त करने के लिए भटकना पड़ रहा है।

राज्य सरकार की कार्यवाही
जनहित याचिका में उठाए गए बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए सरकार ने 29 जनवरी की भगदड़ की जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश हर्ष कुमार की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया है। आयोग अब केवल घटना के कारणों की जांच नहीं करेगा, बल्कि मृतकों और लापता लोगों की पहचान सुनिश्चित करने पर भी ध्यान देगा।

इस फैसले के बाद हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण कर दिया, लेकिन सरकार को जांच निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से करने का निर्देश दिया।

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